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बोधगया वाली कॉफ़ी

News Editor Saturday 5th of September 2020 at 09:24:56 AM Blog
बोधगया वाली कॉफ़ी

डॉ. ख़ुशी वह अमूमन दिल्ली के बाहर जब भी विदेशी यात्राओं पर जाती थी तो लौटते वक्त दिल्ली हवाई अड्डे से उतर मायके होकर ही अपने घर लौटती थी। इस बार भी अपनी दो कॉन्फ्रेंस करके वह लौटी और बहुत ही एक्साइटिड थी कि कोरे कागज़ पर इन दोनों यात्राओं के वृतांत को लिखने के लिए क्योंकि उन दोनों ही कॉन्फ्रेंस में से एक अंतरराष्ट्रीय कॉन्फ्रेंस उसकी सांस्कृतिक धरोहर का हिस्सा था। बुद्ध के धम्म की अनुरागिणी होने के कारण, डॉ. ख़ुशी को बहुत खुशी हो रही थी क्योंकि इस बार वह तथागत की बोधिस्थली बोधगया के न केवल  दर्शन करके ही लौटी थी अपितु तथ्यों की जानकारी सहित ढाई हज़ार साल पुरानी धम्म धरा के दिग्दर्शन करके आई थी, जिसकी वो लंबे अरसे से इच्छुक थी।

बोधगया की इस यात्रा का ज़िक्र वह हमेशा अपने अन्य कलिग और सीनियर प्रोफेसर वालिया जी से किया करती थी। डॉ. गौतम से मुलाकात के पश्चात ही उन्होनें इस बौद्ध संस्कृति को सूक्ष्मता से समझने का प्रयास किया था। उसी के पश्चात बोधगया, सारनाथ, लुम्बिनी, कुशीनगर, श्रावस्ती जैसी पवित्र धम्मभूमियों से परिचित हुई और सम्राट अशोक, सम्राट कनिष्क, सम्राट हर्षवर्धन जैसे यशस्वी चक्रवती सम्राटों के इतिहास से रूबरू होने की जिज्ञासा बलवती हुई। डॉ. गौतम कुछ माह पूर्व दिल्ली छोड़ बिहार में सैटल हो चुके थे। पालि, प्राकृत, बुद्धिस्ट संस्कृति का परिचय भी डॉ. खुशी को डॉ. गौतम से ही हुआ था। उनके जाने के बाद वह संभावना छोड़ चुकी थी कि कभी इन स्थलों का दिग्दर्शन कर पायेंगी। संयोगवश एक दिन डॉ. गौतम ने बताया की बोधगया में एक अंतरराष्ट्रीय सेमिनार का आयोजन हो रहा है जिसमें देश-विदेश के लोग भाग लेंगें। इस संदेश को सुनकर तो जैसे उनके मन की मुराद पूरी हो गई। उन्होनें काफी मेहनत की और थेरीगाथाओं पर रिसर्च पेपर लिखकर भेज दिया जो स्वीकृत हुआ। और इस तरह से बुद्ध के बुद्धत्व की साक्षी बोधगया में पहली बार जाने के लिए डॉ. ख़ुशी रात की पुरुषोत्तम ट्रेन से निकल गई।

आज डॉ. ख़ुशी बोधगया से ही लौटी थीं। घर आकर यात्रा की थकान उतार अगले दिन अपने विभागीय काम से विश्वविद्यालय गईं और वहाँ से वापस निकल ही रहीं थीं कि प्रोफेसर वालिया का फोन आ गया। उन्हें मालूम था कि कल वो दिल्ली लौट चुकी हैं। फोन रिसीव करते ही उनकी खनखती आवाज़ सुनी, "डॉ. साहिबा, कैसी हैं? आज तो ज्वाइनिंग देंगी तो कॉलेज़ आना होगा।" उन्होंने नज़ाकती अंदाज में प्रश्न किया।

"हाँ यार, अभी डिपार्टमेंट आई थी और कॉलेज शुरू होने में चार घंटे हैं तो तब तक लायब्रेरी होकर आ जाती हूँ।" उन्होंने उलझे मन से अपनी बात रखी, "अरे डॉ. साहिबा तो आप मेरे घर आओ फिर साथ ही कॉलेज़ चलेंगें।" "ठीक है, जी अभी आते हैं।" उनका घर यूनिवर्सिटी के पास ही है डॉ. ख़ुशी ने ड्राइवर को उनके घर का रास्ता बताया। उनके फ्लैट पर पहुँच उन्होनें प्रोफेसर वालिया जो उनकी बेहद अजीज़ दोस्त भी थीं उनकी डोर बैल बजाई तो उन्होंने तुरंत दरवाज़ा खोला और ज़ोर से गले लगा लिया "यार आपकी चार दिन की यात्रा ने हमें अकेला कर दिया। बहुत एकाकीपन महसूस किया। चलिये आइए। और वो अपने ड्राइंगरूम की बजाय अपने बैड रूम में ले जाती हैं। जो एक से एक आधुनिक सजावटी वस्तुओं से सजा था। मेड ने ट्रे में फ्राइड बदाम बिस्किट और दो मग कॉफ़ी रख दी। उन्होनें खिलखिलाते हुए कॉफी ऑफर की। "लीजिए कई दिनों बाद आज फ़िर कॉफ़ी में प्यार घुलेगा। दो प्रोफ़ेसर दोस्तों का आपकी हमारी महबूब कॉफ़ी। सच कहें तो चार दिन की कॉफ़ी बिन आपकी रसमयी बातों के गरम पानी की तरह गटकी थी। स्टाफरूम में बग़ल के  सोफ़े पर हमें आपकी कमी खलती रही। आप बताओ कैसा रहा आपका सेमिनार बोर तो नहीं हुए होगें? डॉक्टर साहब जो थे वहाँ।"

"वहाँ भी अपनी कॉफ़ी छाप छोड़ आये हैं जहाँ जाते हैं दिलों में ठिकाना बना आते हैं।" खुशी ने नैन मटका अपनी बात रखी। "अच्छा जी और बताये” प्रोफेसर वालिया प्रसन्नता जाहिर करते हुए। अब यादें इत्र की महक सी बन उनके बैडरूम में फैलने लगी। "हाँ डॉ. गौतम के दो विदेशी मित्र वहाँ आये हुए थे। एक वियतनाम और दूसरे श्रीलंका के केंडी से। उन्होंने फ्राई काजू चबाते हुए कॉफी की सिप ले सुरूड सी ध्वनि निकाल "उनको तो आप जानती है थाइलैंड से, वियतनाम से, श्रीलंका से, मंगोलिया से ऐसे सुदूर देशों तक के मित्र है ख़ासतौर पर बुद्धिस्ट देशों में उनके मित्रों की संख्या खूब है। वहीं श्रीलंका से आये भन्ते जी से मुलाकात हुई, उनका नाम था अरुणासील थेरो। वो भी कॉफ़ी के शौक़ीन और हम भी। सेमिनार स्थल के ठीक सामने एक छोटी सी टी स्टाल थी जहाँ हम सभी ने तीन वक़्त काफ़ी की महफ़िलें जमाईं। क्योंकि वो रिसर्चर थे तो सम्राट अशोक की पुत्री संघमित्रा, देवी तारा, महायान, हीनयान, गौतमबुद्ध के धम्म की शिक्षाओं पर चर्चाएँ कॉफ़ी टेबल पर खूब हुईं।

देखते ही देखते हम अनजान विदेशियों के मित्र बन गये, घूमना-फिरना मार्केट में जाना खूब लुत्फ़ उठाया। लगातार सिप लेते हुए "वहाँ पर लकड़ी से बुद्ध मूर्तियाँ बनाने वाले शिल्पकार का चलते- चलते साक्षात्कार करना बहुत ही रोचक रहा। मज़े की बात ये थी कि श्री लंका वालें भन्ते ज़ी एक बार साथ कॉफ़ी पीने के बाद  चेहरे की थकान का अंदाज़ा लगा कहते थे ‘प्रोफेसर, आई थिंक, यू नीड कॉफ़ी?’ और हँसने लगते, हम भी उनको बराबर कह देते थे, “या स्योर, थैंक्स वेनरेबल फॉर आस्किंग?

"जब थकान फेस पर अंकित होती तो सभी की चंचल आँखें घूमते-फिरते कॉफ़ी शॉप को खोजने लगतीं। आख़िरी शाम हम सभी ने प्लान बनाया कि डिनर होटल में करेंगे। मेरा बेटा हर्ष, डॉ. गौतम का जानकार एक लोकल स्टूडेंट अमन, श्री लंका वाले भन्ते जी सभी ने तिबेटन फूड ऑर्डर किया जिसमें प्रमुख था थूपा, नूडल्स, थिकथुक और इन सबके बीच हमारी पहचान वाली कोल्डड्रिंक। भन्ते जी ने उंगली से इशारा करते हुए कहा, “प्रोफेसर गौतम एंड आई आल्सो बिकम टू न्यू कॉफ़ी लवर्स इन दीज टू डेज व्हाईल स्टैईंग विद डॉक्टर ख़ुशी।”

प्रोफेसर वालिया की मेड ने बातों में दखलंदाजी करते हुए, "मैडम खाना तैयार है, खा लीजिए।" “अरे हाँ चलो ख़ुशी, खाना खा लें फ़िर मैं रेडी हो जाऊँगी और वैसे भी दो बज गये हैं बाकि बातें कॉलेज चलकर करते हैं। आज फिर से खुशनुमा शाम, कॉफ़ी ठहाके और हम दोनों दोस्त।" हमने भोजन किया और कालेज जाने के बाद फ्री क्लास में रोजमर्रा की भांति झाग वाली कॉफी साथ बैठ कॉफ़ी पीते हुए अपनी दोबारा वहां भ्रमण की इच्छा जाहिर की। तभी क्लास बैल की झनझनाहट ट्रिन... ट्रिन... ... हम दोनों बैग उठा अगले लेक्चर के लिए लिफ्ट की ओर बिखरे बालों में उंगलियां घुमाते हुए निकल गए।

 

लेखिका - डॉ. राजकुमारी

(लेखिका दिल्ली विश्वविद्यालय के जाकिर हुसैन दिल्ली कॉलेज (सांध्य) में हिंदी प्रवक्ता हैं। ये किस्सा लेखिका के विभिन्न किस्सों के संग्रहइश्क़--कॉफ़ीका सातवां किस्सा है। लेखिका की इससे पहले ‘दर्द-ए-लफ्ज़’ शायरी संग्रह काफी चर्चित रहा। चार पुस्तकों की लेखिका विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में अनवरत लेखन कार्य करती रहती हैं।)

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