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कॉफ़ी पूरी मोहब्बत अधूरी

News Editor Sunday 30th of August 2020 at 08:06:34 AM Blog
कॉफ़ी पूरी मोहब्बत अधूरी

चार साल पहले की ही तो बात है। जब ईशा से मुलाकात हुई थी। दिल्ली विश्वविद्यालय की आर्ट्स फ़ैकल्टी की एक कैंटीन की खिड़की के पास प्लास्टिक की कुर्सी पर बैठी हुई सामने से घूमते प्रेमी जोड़ों को देख रही थी। खिड़की के बाहर की वल्लरी पर बैठी नन्हीं हल्दी रंग चढ़ी चिरैया को स्थिर दृष्टि से देख रही थी कि तभी चिरैया ने अचानक उड़ उस नाज़ुक सी लता में से थिरकते हुए उड़ान भर दी। डॉ. खुशी ने झिझोड़ दिया। कुर्सी को पीछे खिसका दोनों बैठ गईं। ‘यार आज बहुत सुस्ती है, बहुत आलस्य आ रहा है चल ना यार, आज कॉफ़ी पीते हैं, तू रुक मैं लेकर आती हूँ। वे दोनों हाथों से टेबल का सहारा लेते हुए काउंटर की ओर धीमी गति से चली गईं। इस कैंटीन में सेल्फ सर्विस है। थोड़ी ही देर बाद डॉ. खुशी कॉफ़ी ले हाज़िर हो गई। ईशा को फिर से बाहर झांकते देख उसका हाथ पकड़, "तुम बेजान लाश बनती जा रही हो। भला कौन सा रोग तुम्हें अंदर से खाये जा रहा हैं। पिछले चार साल से हम दोस्त हैं पर आज तक तुमने मुझे अपना नहीं समझा। आज यदि नहीं बताया तो दोस्ती ख़तम उन्होंने तीखे तेवरों से चेतावनी दे डाली। ईशा उसकी इस बात को सुन "नहीं! तुम भी छोड़ चली जाओगी तो मैं जी नहीं पाऊंगी"

ये लफ्ज़ बोलने के बाद उसका रंग पीला पड़ गया। तो बता ना बात क्या है?" देख यार बात करने से मन हल्का होगा। वह नजरें चुरा गर्म कॉफ़ी को छू ‘आ... ..।’ ‘होश में तो हो, अभी हाथ जल जाता तो।’ न केवल कॉफ़ी कैंटीन के फर्श पर बहने लगी, अपितु ईशा का हृदय भी फफक कर रो पड़ा और उसकी आंखों से टपकते हुए आंसुओं ने कॉफ़ी के साथ मिक्स हो एक बाढ़ सी ला दी। ‘कोई नहीं ईशा, बता तो सही, बात क्या है? आज मन कहाँ खो रहा है। रुक मैं पहले तेरे लिए दूसरी कॉफ़ी लाती हूँ।’ दूसरी कॉफ़ी टेबल पर रख उसकी ओर खामोश प्रश्नात्मक निगाहों से देखने लगी।

ईशा ने गहरी सांस छोड़, एक सिप में दो घूंट कॉफी पीकर कप नीच रख, अपनी आंखों की पुतलियां घुमा कंपकंपाते होंठों को दांतों में दबा संयमित लहज़े में कहना शुरू किया। “मेरी पहचान तकरीबन दो वर्ष पहले ही सुनील से सोशल मीडिया के माध्यम से हुई थी। अपनी फ्रेंड लिस्ट के कॉमन से लड़के को वह नहीं जान पाती यदि इतेफाक से दिल्ली के सामाजिक आंदोलन में आये सुनील ने यदि उसे कॉन्टेक्ट नहीं किया होता। सुनील के परिवार के कुछ लोग दिल्ली निवासी थे तो आगरा से महानगर दिल्ली आना-जाना अक्सर होता रहता था। एक विचारधारा होने के कारण धीरे-धीरे दोनों की दोस्ती गहरी हुई। सुनील जब पहली बार मिला तो मैंने उसे आक्सफोर्ड बुक स्टोर में मिलने को कहा और दोनों की पहली मुलाकात वहीं कॉल पर बात कर निश्चित स्थान बताते हुए हुई। बुक स्टोर की सीढ़ियों को चढ़ते हुए सुनील से हाल-चाल पूछा सुनील ने अपनी लॉ डिग्री का ज़िक्र करते हुए बताया कि उसका द्वितीय वर्ष चल रहा है। हम दोनों बुक स्टोर के कॉफी कॉर्नर की चेयर पर जा बैठे "आप क्या लेंगे मिस्टर सुनील?" जो आपकी इच्छा। अपनी चेयर पर बैठ-बैठे ही वेटर को "एक्सक्यूजमी, प्लीज़ टू हॉट काफ़ी।" वेटर आर्डर ले चला गया ।"क्या आप चाय नहीं पीती, नहीं  हम चाय नहीं पीते, सुनील जी।" वेटर ने दो कॉफी प्याले जिन पर हार्ट बने थे दोनों के सामने रख दिए। वह आस-पास बैठे लोगों में शायद अनकंफर्टेबल फील कर रहा था। शायद बड़े शहरों का माहौल उसे रुचा नहीं। "सुनील जी कॉफी लीजिए" वैसे सच कहूँ तो यहां की कॉफ़ी और ये पुस्तकें मुझे बेहद पसंद हैं।" शायद वह भी रिलेक्स कर चुका था। मैनें अपनी कॉफी में शुगर मिला ली। उनके चेहरे पर शरारती सी मुस्कान उभर आई और अपने सलीखे से "जी मुझे  शुगर मिला इस आकृति को बिगड़ना अच्छा नहीं लग रहा।"

उन्होंने बातों ही बातों में चम्मच से हर्ट को घुमाया और शुगर घोल कर पीने लगे। कनॉट प्लेस के कॉफ़ी हाऊस में एक कोना यदि कॉफ़ी का है तो दूसरी ओर ज्ञान का अदम्य भंडार जहाँ ढेर सारी बुक्स सेल्फ में लगी हुई हैं। स्टोरीज बुक्स जो लाल, नीले, पीले, हरे पंचशील रंगो से मोहित करती है। “मेरा मन पुस्तकों की ओर आकर्षित होते देर नहीं लगी। कॉफी मेरे नीले नेलपेंट लगे हाथों में और नज़रे किताबों की गिरफ़्त में थी क्यों कि पहले भी कई पुस्तकों के विमोचनो में जा चुकी थी। कनॉट प्लेस के इस लुभावने स्थान में जो सुकून मिलता है वो मुझ सी पाठक और युवा लेखिका को मुक्कमल करता है। कॉफी पीते हुए सुनील को बहुत सी ख़ासियत उस स्थान की बताई। बतौर यादगार कुछ तस्वीरें भी लीं। एक घंटे में अजनबीपन समाप्त हो हम अच्छे दोस्त बन गये और सीढ़ियॉ उतरते हुए बातचीत करते हुए दोनों सड़क तक आ गये। उसने कॉम्पलीमेंट दिया। "आप सोशल मीडिया की वॉल पर ही नहीं बल्कि वैचारिक और दिली तौर पर भी हसीन हैं आपका दिल वैसा ही सॉफ्ट हैं जैसा कॉफ़ी मग में था।" हँसने लगी और सुनील की ओर देखते हुए "मिस्टर सुनील हार्ट दो थे दोनों ही घुलनशील आपके हमारे दिलों की भाँति" बाए कह कर हम दोनों अपनी-अपनी मंजिल की ओर चल दिये।”

उसने अपनी ठंडी कॉफी उठाई ओर गटक ली। “चन्द दिनों में बातों का सिलसिला बड़ा हालात कुछ ऐसे हुए कि एक दिन भी बात किए बिन रह पाना नामुमकिन होता गया। अब दो तीन महीने में मुलाकात होने लगी। एक दिन जब वह मिलने आया तो उसने पूरी ताकत से अपनी मजबूत बाहों में समेट अपनी बाजुओं को गर्दन में डाल जोर से लबों पर लब रख चूम लिया और उसकी सांसे मुझमें समा गईं। उसके जाने के बाद बहुत कोशिश की उसे खोजने की, सोशल मीडिया से फोन कॉल्स तक सब बन्द था। दो साल बाद मालूम हुआ कि उसका कई लड़कियों से सम्बन्ध था।”

बिखरे लहज़े का संवाद प्रेम, फरेब और आकर्षण बनता जा रहा हैं जिसमें आधुनिकता के नाम पर जिस्मानी ताल्लुकात महत्वपूर्ण हो गए और भावनाओं की ब्लैकमेलिंग। सामने बैठी डॉ. खुशी ने देखा वह ठंडी पड़ चुकी थी। इससे पहले कि उसके होशो-हवास गायब हो उसने सांत्वना देते हुए कहा, "संकीर्ण मानसिकता का सम्बन्ध किसी जाति, सम्प्रदाय से नहीं होता। तुच्छ सोच किसी की भी हो सकती हैं खैर, दुःस्वप्न समझकर भूल जाओ, शुक्र करो कुछ ओर नहीं घटा। जिंदगी आगे बढ़ने का नाम है, किसी एक बिन्दु पर रुकने का नहीं। चलो घर चलते हैं। पाँच बज चुके हैं, इससे पहले की अंधेरा हो।” उठकर दोनों मेट्रो की ओर पैदल ही चलने लगती हैं।

 

लेखिका - डॉ. राजकुमारी

(लेखिका दिल्ली विश्वविद्यालय के जाकिर हुसैन दिल्ली कॉलेज (सांध्य) में हिंदी प्रवक्ता हैं। ये किस्सा लेखिका के विभिन्न किस्सों के संग्रहइश्क़--कॉफ़ीका छठवां किस्सा है। लेखिका की इससे पहले ‘दर्द-ए-लफ्ज़’ शायरी संग्रह काफी चर्चित रहा। चार पुस्तकों की लेखिका विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में अनवरत लेखन कार्य करती रहती हैं।)

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दूसरा किस्सा पेरिस से आया मेरा दोस्त पढ़ने के लिए क्लिक करें

तीसरा किस्सा मजनू के टीले वाली कॉफ़ी पढ़ने के लिए क्लिक करें

चौथा किस्सा आँखों में प्यार ही प्यार बेशुमार पढ़ने के लिए क्लिक करें

पांचवां किस्सा यादों को दोहराती शिमला वाली कॉफ़ी पढ़ने के लिए क्लिक करें

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