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'जय भीम' : लोकतंत्र और संविधान की न्यायवादी अहिंसक डगर का आदिवासी आख्यान - जितेन्द्र विसारिया

News Editor Friday 12th of November 2021 at 11:00:37 AM Entertainment
'जय भीम' : लोकतंत्र और संविधान की न्यायवादी अहिंसक डगर का आदिवासी आख्यान - जितेन्द्र विसारिया

'जय भीम' मूवी देख ली। साथ ही उस पर लोगों की निरन्तर आती प्रतिक्रियाओं को भी देख रहा हूँ। कथानक क्या है, यह अब तक लगभग सभी को पता चल चुका है। जिन्हें मूवी के वास्तविक कथानक में परतीत नहीं, वे ऐसी घटनाओं के बारे में लिखी-लक्ष्मण गायकवाड़ की आत्मकथा-'उठाईगीर' और 'उचक्का'; मैत्रेयी पुष्पा का उपन्यास-'अल्मा कबूतरी' पढ़ अथवा राजस्थानी मूवी 'जरायम दादरसी' देख सकते हैं।

जैन तीर्थंकर महावीर स्वामी ने भले ही इस देश में कभी कहा हो-'मनुष्य जन्म से नहीं कर्म से महान होता है।' पर इस देश की तथाकथित महान सनातन संस्कृति में जन्में और अपने को जन्मजात श्रेष्ठ मानने वाले भले आदमियों और उनके आका अंग्रेजों ने, इस देश के सबसे आदिम रहवासियों में से कुछ-एक विद्रोही प्रवृत्ति के मनुष्यों और उनकी सद्य:जात संतानों को, जन्मजात अपराधी ही मान लिया था/ है। जिनके सुविधानुसार कई नाम हैं-ज़रायम पेशा/अपराधी जनजाति अथवा क्रिमनिनल ट्राइब्स।

कहने को ब्रिटिशकाल : 1871 में निर्मित यह 'क्रिमिनिल ट्राइब्स एक्ट',  31 अगस्त 1952 को समाप्त कर दिया गया है और तबसे इन तथाकथित भूतपूर्व अपराधी समुदायों को सरकारी दस्तावेज़ों में विमुक्त जनजाति मान लिया है। ...पर इस देश की आगामी सरकारों और सरकारी तंत्र में बैठे तथाकथित जन्मना श्रेष्ठ होने की ग्रन्थि से पीड़ित वर्ग ने, इन्हें मन से कभी जन्मजात मनुष्य स्वीकार ही नहीं किया। यूँ उन्होंने इन विमुक्त और घुमन्तू जनजातियों से थोड़ा सभ्य; थोड़ा शहरी; थोड़ा ग्रामीण, दलित-पिछड़े और आदिवासियों को भी कहाँ किया है?

तो 'जय भीम' तमिलनाडु की एक ऐसी ही  जन्मजात अपराधी करार दे दी गई, 'इरुलर' जनजाति के एक व्यक्ति 'राजकन्नू' की, गाँव के सरपंच के घर हुई गहनों की चोरी के आरोप में पुलिस कस्टडी में हुई मौत और उसके लिए न्याय माँगती उसकी पत्नी 'सेंगीनि' और उसके वकील 'चन्द्रू' की आपबीती पर आधारित एक सत्यकथा है। घटनाकाल 1995।

'जय भीम' कितनी हक़ीक़त और कितना फ़साना है? इससे अधिक इस फ़िल्म के शीर्षक पर चर्चा हो रही है। बाबा साहेब आम्बेडकर को लगभग अपना ब्रांड मान चुके तथाकथित आम्बेडकरवादी और बहुजन तबका, इसके शीर्षक के अनुरूप कथानक न होने पर आपत्ति दर्ज़ कर रहा है, तो कुछ नए आदिवासी मुल्ले आदिवासियत की ज्यादा प्याज़ खाने के चलते मूवी के 'जय भीम' शीर्षक पर ही आपत्ति कर रहे हैं कि इसका शीर्षक, 'जय भीम' के स्थान पर 'उलगुलान' या 'जय जोहार' क्यों नहीं रखा गया?

...वामपंथियों को संसदीय न्याय प्रणाली में कभी भरोसा बैठा ही नहीं, सो उनके लिए इस फ़िल्म का कोई बड़ा महत्व है नहीं...हाँ, कुछ जो वामपंथी रहते जनेऊ और जाति दोनों ही सम्हाले रहे, वे मार्क्स, पेरियार और आम्बेडकर के इस इस मेल पर उल्टियाँ किये दे रहे हैं। ...तथाकथित विश्व गुरुओं की ओर से कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया आई नहीं है, सो उनके मते का हम कोई परमान मानते नहीं।

अब अपना मत। पहली बात एक्टिविज़्म के नाम पर लगभग शून्य तथाकथित अम्बेडकरवादियों से कि 'जय भीम' आपका ब्रांड नेम नहीं कि आप ही उसे अपनी मर्ज़ी से यूज़ करोगे। 'जय भीम' आज भारतीय उपमहाद्वीप ही नहीं, एशिया और विश्व में लोकतंत्र, संसदीय प्रणाली और समाजवादी संविधान में भरोसा रखने वाले मनुष्यों की आशा का केंद्र बन चुका है। ...कोई यदि उनका नाम लिए बग़ैर, उनके बताए मार्ग को सफल मार्ग बताता है तो उसे  ख़ुशी-ख़ुशी इसका प्रयोग करने दीजिए।

दूसरी बात आदिवासियत के नए-नए बने मुल्लाओं से। आदिवासियत, उलगुलान, 'जय जोहार' बहुत ही प्रिय वाक्य हैं। क्रांतिकारी भी। ...मैं व्यक्तिगत रूप से मानता हूँ कि मनुष्य ही नहीं पृथ्वी के सम्पूर्ण परितंत्र के लिए विनाशकारी, पूँजीवादी व्यवस्था के विरुद्ध 'आदिवासियत का दर्शन',  एक कारगर उपाय है। हम सब को इस दिशा में बढ़ना ही चाहिए, अन्यथा हम शीघ्र ही अपने-अपने विनाश को प्राप्त होंगे। 

...पर फ़िल्म के सन्दर्भ में देखें तो 'जय भीम' साउथ की अपनी पूर्वर्ती दो फिल्में, 'कर्णन' और 'असुरन' के आगे की फ़िल्म है। उपरोक्त दोनों फिल्में हिंसा के माध्यम से व्यवस्था सुधार की बातें करती हैं और अपने मूल में वे असफल हैं। जिस बड़े फलक पर 'जय भीम' मूवी की नायका 'सेंगिनी' और वकील 'चन्द्रू' का संघर्ष फैला हुआ है। उस की शुरुआत् हम 'असुरन' मूवी के अंत में अवश्य देखते हैं, जहाँ असुरन मूवी का नायक तमाम हिंसक प्रतिशोधों के उपरांत अपने बच्चे को कोर्ट के बाहर पढ़ने और हिंसक रास्ता छोड़ देने की बात करता है-"देख चिंता! यदि ज़मीन होगी कोई भी छीन लेगा, पैसा होगा कोई भी लूट लेगा... तूँ पढ़ा लिखा होगा, तो तुझसे कोई कुछ नहीं छीन सकता। अगर तुझे अन्याय से जीतना है, तो पढ़; पढ़-लिखकर एक ताक़तवर इंसान बन। ...लेकिन अपनी ताक़त का ग़लत इस्तेमाल मत करना, जैसे आजकल लोग कर रहे हैं। नफ़रत हमें तोड़ती है, प्यार हमें जोड़ता है। हम एक ही मिट्टी के बने हैं, लेकिन जातिवाद ने हमें अलग कर दिया। हम सबको इस सोच से उबरना होगा।"

‘असुरन’ मूवी का संवाद जब हम ‘जय भीम’ मूवी से मिलाकर देखते हैं। …देखते हैं हम इस देश में जाति और जंगल को बचाये रखने में प्रयुक्त हुए तमाम हिंसक रास्ते, जो अपने मूल लक्ष्य और परिणाम में भले ही क्रांतिकारी लगे हों पर वे समस्या का कोई स्थायी हल अब तक उपलब्ध नहीं करा सके हैं। उल्टे सरकार, पुलिस और हिंसा के मार्ग में विश्वास रखने वाले अपने ही लोगों के बीच, आदिवासी चक्की के दो पाटों के बीच पिसते आ रहे हैं।

ऐसे में ‘असुरन’ के बाद ‘जय भीम’ मूवी के आदिवासी मुक्ति के अहिंसक और स्थायी जीत के भीमवादी मार्ग के बारे में, आपको ठंडे मन से विचार करना चाहिए। विचार करना चाहिए कि आम्बेडकर, मार्क्स और पेरियार के नाम के सहारे उत्तर-दक्षिण में खड़ी हुई बहुजन राजनीति और सामाजिक आंदोलन, देश की रसजनीति में अपना एक अच्छा-ख़ासा वर्चस्व बनाये हुए है.... और आप हैं कि अभी भी गणतंत्र दिवस और छब्बीस जनवरी की परेडों में नृत्य करने तक ही सीमित हो। राष्ट्रीय फलक पर न आपकी कोई स्वतंत्र पार्टी है, न कोई बड़ा नेतृत्व!!! …आदिवासी परिवेश में की कहानी का ‘जय भीम’ शीर्षक और वकील चन्द्रू के माध्यम से मूवी की नायिका ‘सेंगिनी’ को न्याय मिलना, इंगित करता है कि किसानों, दलितों और पिछड़ों के साथ-साथ इस देश में आदिवासियों के न्याय और मुक्ति का रास्ता भी संविधान और समाजवादी गणतंत्र में विश्वास की ओर ही जाता है, न कि किन्ही माओ और ट्रोट्स्की के रास्ते।

आन्तिम बात वकील चन्द्रू के घर की दीवाल पर लगी तस्वीर, जिसमें बाएँ मार्क्स, बीच में आम्बेडकर और दायीं ओर पेरियार अवस्थित हैं। तो यह दक्षिण है…कहते हैं कि मध्यकाल में उसी दक्षिण अथवा द्रविड़ देश से, भक्ति आन्दोलन उठ खड़ा हुआ था और उसने अपनी चपेट में सारा उत्तर-दक्षिण, पूर्व-पश्चिमी भारत ले लिया था। ‘जयभीम’ की ललकार उसी दक्षिण से उठी है। जिसमें मार्क्स के साथ पेरियार और आम्बेडकर भी  हैं। वह आपके जाति और जनेऊ में लिपटे और भारतीय साम्यवादी बहुजन चिंतकों (बुद्ध, चार्वाक, मक्खलि गोशाल, अशोक, नाथ-सिद्ध, कबीर, रैदास, चोखामेला, फुले, पेरियार, आम्बेडकर) से दूर-दूर भागते, द्विज कॉमरेडों की अब तक चली आई हठधर्मिता से आगे की बड़ी चीज़ है, जिसे फूँक से अब आपकी फूँक से नहीं उड़ाया जा सकता।

इस लेख में जो बात सबसे कम कही गई वो पिछड़ों से है। उन्हें भी इस मूवी को देखकर खुश होना चाहिए कि इस फ़िल्म का नायक एक पिछड़ा वकील है। अभी इतिहास में यह बात दर्ज़ हो रही है कि 1956 में बाबा साहेब अंबेडकर के अवसान और 1985 में मा. कांशीराम जी के उभार के बीच, पेरियार ललई सिंह, राम स्वरूप वर्मा, बाबू जगदेव प्रसाद और बी.पी मंडल ने उत्तर में लोकतंत्र, संविधान और अम्बेडकरवाद की आम जन में जो अलख जगाए रखी थी। वही पिछड़े आज वकील चन्द्रू अथवा लक्ष्मण यादव के रूप में इस कड़ीं को नहीं टूटने दे रहे हैं, यह लोकतंत्र और समाजवादी भारतीय संसदीय प्रणाली के लिए एक तरह से शुभ ही है।

बिल्कुल अंतिम बात उत्तर के दक्षिणद्रोही साहित्यकारों, बुद्धिजीवियों और मनुष्यों से कि आपको इस फ़िल्म में कोरा विद्रोह ही दिखा, सिनेमाई साहित्यिक संवेदना नहीं? तो यह आपका दृष्टिदोष है, फ़िल्म की कमज़ोरी नहीं। ...काश! आपने तमिल 'संगम' साहित्य के प्रसिद्ध काव्य मणि मेखलयी' और 'शिलप्पादिकारम' ही पढ़े होते। 'शिलप्पादिकाराम' नहीं पढ़ा, तो हिंदी के प्रसिद्ध उपन्यासकार अमृतलाल नागर जी का 'सुहाग के नूपुर' उपन्यास ही पढ़ा होता, तो आप 'जय भीम' मूवी में गहने चोरी की घटना और फ़िल्म के नायक-नायिका राजा कन्नू और सेंगिनी का तारतम्य 'शिलप्पादिकारम' के कोवलन और कन्नगी से अवश्य जोड़ते। 

'शिलप्पादिकाराम' में भी मदुरा के राजा की रानी का एक पायल, राजवंश के सुनार के षङ्यंत्र से चोरी हो जाता है। राजा के सिपाहियों ने 'कोवलन' को संदेह में पकङ कर बिना अभियोग चलाये ही मार डाला था। कण्णगि दूसरा पायल लेकर राजा के पास गयी तथा अपने पति की निर्दोषता का प्रमाण दिया। आत्मग्लानि से राजा की मृत्यु हो गयी। उसके बाद कण्णगि ने अपनी क्रोधाग्नि से मदुरा को जला डाला तथा बाद में वह चेर राज्य चली गईं। फ़िल्म 'जय भीम' में वकील चन्द्रू जब कोर्ट में जजों के सामने कहता है-"यह जो इस राज्य का इतिहास नहीं जानते...यह सेंगिनी जो अपने पति की हत्या का इंसाफ़ चाहती है, वो सेंगिनी नहीं वो आज की 'कन्नगी' है और उसका पिटीशन आज का शिलप्पादिकाराम! इतिहास यूँ ही दोहराया जाएगा या इसे इंसाफ़ मिलेगा, इसका फैसला मैं कोर्ट पर छोड़ता हूँ।" तब इस संवाद से 'जय भीम' मूवी पर 'शिलप्पादिकारम' का प्रभाव भी प्रमाणित हो जाता है।

बात साहित्य की जाए तो जिन्होंने फणीश्वरनाथ रेणु की 'ठेस' कहानी पढ़ी है और जो "गाँव की बेटी सबकी बेटी होती है" इस भक्ति भावना से भरे हुए गाँव की सदाशयता का बखान करते नहीं थकते उन्हें यह मूवी भी देखनी चाहिए। जब राजाकन्नू सरपंच के घर से साँप पकड़कर निकलता है और सरपंच के पैसे देने पर उससे रुपए लेने से यह कहकर इनकार कर देता है-"अरे मालिक! मैं तो आपकी मदद कर रहा था और तो और मालकिन भी हमारे गांव से...।" 

उस वक़्त हमें 'ठेस' का सिरचन और 'जयभीम' का 'राजा कन्नू' एक जैसे लगते हैं। पर ठीक उसके बाद सरपंच से पहले कार में बैठी, सरपंच की पत्नी का राजाकन्नू को यह टके सा जवाब -"मैं और तेरे गांव से? अपनी शक्ल देखी है आईने में?? अब तूँ बोलेगा मैं तेरी बिरादरी की भी हूँ...।" संवाद 'गाँव की बेटी सबकी बेटी' का आदर्श एकदम तार-तार कर देता है। मुफ़्त श्रम करते और बिना जाति देखे स्नेह का नाता निभाने के एवज़ में सिरचन और राजा कन्नू दोनों ही जगह (उत्तर-दक्षिण) अपमानित ही होते हैं, यह है आपके ग्रामीण जातीय समाजिक सौहार्द का सार्वभौमिक सच, जिसे 'जय भीम' मूवी ने आपकी आँखों में उँगली डालकर दिखा दिया है। यह सब आपको तब भी सच नहीं लगता, तो आपकी बला से... यूँ दुनिया इस माध्यम से उसे देख ही चुकी है।

 -जितेन्द्र विसारिया

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