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प्रेम और भारतीय समाज..! जितेन्द्र विसारिया

News Editor Wednesday 6th of May 2020 at 07:35:04 PM Coverstory
प्रेम और भारतीय समाज..! जितेन्द्र विसारिया

"प्रेम और हमारा समाज" - जितेन्द्र विसारिया

‘प्रेम और समाज का सम्बन्ध स्थाई रूप से द्वन्द्वात्मक है। प्रेम मनुष्य की स्वतत्रंता की प्रखरतम
अभिव्यक्ति है। वह किसी भी व्यवधान व अंकुश को नहीं मानता। आयु, जाति, धर्म, राज्य, इतिहास, नैतिकता की सीमाएँ या बंधन उसके लिए अस्तित्वहीन हैं। जबकि समाज इनका पोषक है, नियंत्रक है, प्रहरी है। प्रेम में दोनों पात्र सिर्फ अपने बारे में सोचते हैं। उनकी नितांत व्यक्तिगत संवेदना स्वप्न, व निष्ठाएँ उनके व्यक्तिगत स्वतत्रंताबोध से जन्मती हैं। इस स्वतंत्रता को समाज अपने ऊपर प्रहार समझता है।’ ...बन्द गलियों वाला हमारा एशियाई समाज आज भी कबीलाई ढाँचे व सोच पर टिका है। इस का सारा धर्म, दर्शन, इतिहास, समाज और उसकी नैतिकताएँ यौनिकता से जुड़ी हुयी हैं। जो दो विपरीत वर्ग, जाति, धर्म और समाज के स्त्री पुरूषों के समीप आते ही चरमरा उठती हैं! उनके निश्चल प्रेम में समाज के स्वंयभुओं को अपना सर्वनाश दिखाई देने लगता है और जारी ही नहीं अमल में भी लाए जाते हैं, संगसार करने, दीवाल में चुनवा देने अथवा भरी पंचायत में फाँसी दे देने के क्रूर और अमानवीय फतवे!!!

‘आदम और हव्वा के जमाने से ही पुरूष और स्त्री के बीच के प्रेम का सहज आकर्षण और समाज द्वारा उसके नियंत्रण की कोशिशें जारी हैं। मनोविज्ञान और जीव विज्ञान दोनों इसे सहज और प्राकृतिक मानते बताते हैं। लेकिन जैसे-जैसे सामाजिक-आर्थिक व्यवस्थाएँ बनी और उसमें विभिन्न संस्तर (Layers) बने वैसे-वैसे ही प्रेम पर नियंत्रण की कोशिशे और तेज हो गईं। राजा-महाराजाओं के सामंती युग में विवाह और प्रेम के निर्णय व्यक्तिगत न हो कर सामाजिक हो गये। पिता और समाज के नियंता पुरोहित, पादरी और मौलवी तय करने लगे कि शादी किसके साथ होनी चाहिये। पुरुष प्रधान समाज में औरत और दलित कही जाने वाली जातियोें को घरों में कैद कर दिया गया और उनकी पढ़ाई लिखाई पर रोक लगा दी गई कि कहीं वे अपने अधिकारों की माँग न कर बैठें।‘यत्र नार्ययस्तु पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवता’ किताबों में कैद रहा और औरतें चूल्हे से लेकर चिताओं तक में सुलगती रहीं।

‘वास्तविक प्रेम देह से गुजर कर आता है जो सहज स्थिति में रहता है। देह से अलग होने पर वह
आत्मदमन की ओर प्रवृत्त होता है। फ्रायड की परिभाषाओं के अनुसार यह ‘दमन’ मनुष्य को किसी भी दिशा में ढकेल सकता है। आप चाहें तो इसे गाँधी का आत्मदमन और परपीड़न इस दृष्टि से देख सकते हैं। चाहें विश्व के श्रेष्ठ रचनात्मक कार्यों को। इस दमन और उत्पीड़न से जन्में आत्मनाश के रूप में हमारे सामने देवदास है। देवदास ने पारो को स्पर्श भी नहीं किया था, हालाँकि पारो को कोई आपत्ति नहीं होती। देवदास पारो की देह से गुजरा होता, तो वह प्रेम के नाम पर वह आत्मनाशी नहीं बनता। प्रेम के ऊपर इतने कठोर बंधनों ने ही समाज में व्यभिचार, बलात्कार और स्त्री परतंत्रता को जन्म दिया है। स्वंयवर के रूप में विवाह प्रथा में प्रेम भले ही आधार रहा हो, इसके इतर विवाह संस्था का उपयोग समाज द्वारा प्रेम पर अंकुश लगाने, बालविवाह के माध्यम से स्त्री को अधिक से अधिक परतंत्र और निर्बल बनाने, उसकी स्वीकृति,अस्वीकृति जाने बगैर पुरूष (पति) द्वारा उसके साथ आजन्म बलात्कार करते हुए, उसे बच्चे पैदा करने वाली मशीन के रूप में परिवर्तित करने में हुआ है। प्रेम की इन्हीं कठोर वर्जनाओं के चलते पश्चिम की अपेक्षा एशियाई समाज में पलें बढ़े युवक युवतियों में काम जनित विकृतियाँ और कुँठाएँ अधिक मात्रा में पायी जाती हैं। ऐसे में हिन्दी की प्रसिद्ध सहित्यकार मृदुला गर्ग जब यह एक जगह यह कहती हैं कि ‘‘भारतीय पुरूष स्वस्थ यौनिक आनंद नहीं उठा पाता। हिंसा और ज़बरदस्ती द्वारा ही अपनी मर्दानगी साबित करने में आस्था रखता है’’ तब वह अपनी जगह गलत नहीं होतीं।

इतिहास गवाह है कि प्रेम और समाज के साश्वत द्वन्द के रूप में अधिकांश प्रेमकथाएँ बंद समाजों में ही पैदा हुयी हैं। जो सदियों से कही और सुनी जाती रही हैं। इन प्रेमकथाओं में समाज पर प्रेम का प्रहार बिम्बित होता है। विश्व की समस्त बड़ी प्रेम कथाओं में प्रेम का पारस्परिक संघर्ष नहीं, प्रेम का समाज से संघर्ष ही प्रमुख विषय रहा है। फिर वह चाहे दो कबीलों की आपसी रंजिस में पिसते हुए आत्म हत्या करने वाले लैला-मजनू संयुक्त परिवारों में अविवाहित छोड़ दिये गये भाई की सर्वनाशी कुंठाओं के शिकार हीर-राझाँ की अमर कहानी/ गरीब परिवारों द्वारा अमीरों साथ मजबूरी वश किये जाने वाले विवाह के विरोध में खड़ी सोेहनी-महिवाल की प्रेम कथा/अपनी नस्ल की खातिर अपने बेटे की प्रेमिका को उसके शासक पिता द्वारा दीवार में जिन्दा चुनवाये जाने वाली सलीम और अनार कली की फंतासी दास्तान हो या अपने से नीची जाति की लड़की से विवाह न करने देने की जिद पर अड़े उच्च-जाति के परिवार के एक आत्म नाशी युवक देवदास की करुण कथा। सबमें ही हम प्रेम से अधिक सामाजिक संघर्ष की अनुगूँज सुनते हैं।

...सोहनी-महिवाल प्रेम-कथा में कबीले की रानी के भाई के साथ सोहनी के द्वारा विवाह से इन्कार करने पर, कबीले की रानी गाँव के सारे कुम्हारों को अपने खेतों से मिट्टी न लेने देने का हुक्म जारी करती है।

जिससे मज़बूर कबीले की पंचायत दबाब डालकर सोहनी के पिता को उसका विवाह रानी के भाई के साथ करने को विवश कर लेते हैं। उस समय पंचायत के समक्ष विवाह के लिए परवश पिता के समक्ष खड़ी सोहनी का यह प्रश्न-  

"अब्बा! आप बचपन में एक कहानी सुनाया करते थे कि जब नील नदी में बाढ़ आती थी, तब उसके उतरने के लिए सारे कबीले वाले मिलकर एक कुँवारी कन्या की बलि चढ़ाते थे। क्या मैं वही कुँवारी लड़की हूँ...?"

यह प्रश्न उस हर एक अविवाहित लड़की का है जिसको कभी जाति और धर्म के नाम पर, तो कभी समाज और परिवार की आन-बान-शान के नाम पर, पिता, परिवार और जाति-बिरादरी के द्वारा उसकी इच्छा-उपेक्षाओं को कुचलते हुए एक ऐसे व्यक्ति के साथ जीवन भर के लिए बाँध दिया जाता है, जिससे उसने कभी प्रेम किया ही नहीं था। न ही कभी हो सकने की उम्मीद हो!...उसी तरह हिन्दी सिनेमा में मील का पत्थर बन चुकी कमाल अमरोही की प्रसादांत प्रेम कथात्मक फिल्म ‘पाकीज़ा’ में, जब तवायफ़ साहिब जान को एक ख़ानदानी युवक सलीम एक संरक्षक के रूप में अपने घर लाता है। तब उसके अज्ञात मज़हब और खानदान पर शक करते हुए उसके दादा उसे अपनी बदनामी कासबब मानते हुए अपनी हवेली में पनाह देने से मना कर देते हैं। उस समय युवक सलीम का यह कथन कि-‘‘बेशक...मैं भूल ही गया था कि इस घर के इन्सानों को हर एक साँस के बाद, दूसरी साँस लेने के लिए आपकी इजा़जत लेनी पड़ती है ... आपकी औलाद खुदा की बनाई ज़मीन पर नहीं, आपकी हथेली पर रेंगती है।’’ उस समय सलीम की भूमिका मात्र एक भावुक प्रेमी की न होकर, उस हर एक स्वतंत्रेच्छु युवक की हो जाती है जो अपनी प्रेमिका का हाथ थामें अपने घर के द्वार पर इस अपेक्षा से आ खड़ा है कि उसके परिजन उसकी स्वतंत्र इच्छाओं का सम्मान करते हुए, उसके प्रेम को स्वीकार कर लेंगे...। परन्तु इसके विपरीत जाति-धर्म कुल-गौत्र, भाषा और रंगभेद की मानसिकता में जकड़े परिवार में जब वह अपने लिए जगह तो क्या सच्ची सहानुभूति भी नहीं पाता। तब उसके शब्द ठीक सलीम के समान ही तीखे और व्यंग्य पूर्ण होते हैं।

फिर भी समाज के तमाम बन्धनों के बाबजूद, प्रेम जीवित है। भले ही उसका पंथ आग के दरिया
जैसा भयंकर या तलवार की धार जैसा तीक्ष्ण हो, प्रेम पंथ के राही उस पर चल कर अपना सफ़र तय करते ही करते हैं। भले ही उसकी सजा भी कुछ हो...। मानव हृदय की स्वतंत्र अभिव्यक्ति के रूप में प्रेम समाज में सदैव जीवित रहा है। प्रेम दो व्यक्तियों द्वारा स्वेक्षा से एक दूसरे को ग्रहण करने का नाम है। वहाँ दो प्राणी स्वतंत्र होकर भी एक होते हैं, और एक होकर भी स्वतंत्र। प्रेम में कोई एक अपना सर्वस्व दान कर हमेशा हमेशा के लिए किसी का गुलाम नहीं बनता। जबकि विवाह के संस्कार में स्त्री के लिए गुलामी के बीज मौजूद हैं। प्रेम विवाहों में अधिकांश के असफल होने के पीछे यही मनौविज्ञाान काम करता है, कि जिस लड़की ने एक स्वतंत्र व्यक्तित्व के रूप में जिससे प्रेम किया और बराबरी के साथ जीवन भर साथ रहने की उम्मीद पर उससे विवाह किया था। उसी ने विवाह कर घर में डालने के बाद, उस पर तमाम बंन्दिसें लगा दी हैं...!

परन्तु इसका आशय यह नहीं कि विवाह संस्था में प्रेम अस्तित्व हीन है या समाज में प्रेम होता ही नहीं है। सामान्यतः प्रेम समाज के अनुशासन व निर्देश के अनुरूप ही स्वीकृत और व्यवहृत होता रहा है। प्रेम और स्वतंत्रता समाज की सबसे सुन्दरतम और अनन्यतम कृति हैं। प्रेम का मतलब उच्छृखलता कतई नहीं है। प्रेम सारे बन्धनों से ऊपर मनुष्य को मनुष्य से जोड़ता है। अरस्तू कहता है ‘कि जो मनुष्य समाज में नहीं रहता वह या तो पशु है अथवा देवता।’ मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है।समाज से अलग उसका कोई अस्तित्व ही नहीं है। प्रेम भी समाज में ही पैदा होता है और समाज ही उसे मारता है और समाज ही उसे जिलाए हुए है। वह समाज की ही अनुभूति है। हवा और पानी की तरह, वह हर जगह व्याप्त है। फिर चाहे वह अफ्रीका के घने जंगल, हिमालय की कंदराएँ, तपते रेगिस्तान की मरूभूमि हो अथवा उत्तरी धुर्व की बर्फीली बादियाँ, उसका अस्तित्व हर जगह है।

‘जैसे एक ही जाति प्रजाति के पेड़ों के एक से रगं-शेड भी विभिन्न होते हैं। प्रेम की अनुभूतियाँ भी
विभिन्न जीव-ध्वनियों की फ्रीक्वेंसी की भाँति असंख्य हैं। प्रेम के प्रतिमान हमेशा बदलते रहे हैं। समय और समाज की परिस्थितियों के अनुसार प्रेम के मायने भी बदले हैं, क्योंकि विविधता और बदलाव ही सृष्टि का सौन्दर्य हैं।

‘सामंती समाज के विघटन के साथ-साथ जो नई सामाजिक-आर्थिक व्यवस्था औद्यौगिक क्रान्ती के साथ सामने आई उसने जनतंत्र को जन्म दिया जो मूलतः समानता,भाईचार,और व्यक्ति की स्वतंत्र अस्मिता (Identity) के सम्मान पर आधारित थी। यह आजा़दी अपनी ज़िदगी के तमाम फैसलों की आज़ादी थी और समानता का मतलब था जन्म (भारत के संदर्भ में धर्म, जाति, जेन्डर, और क्षेत्रियता )के आधार पर होने वाले भेदभवों का अन्त। यही वज़ह थी कि हमारे संविधान में जहाँ सबको वोट देने का हक़ दिया गया,वहीं दलितों, स्त्रियों और दूसरे वंचित तबकों की सुरक्षा तथा प्रगति के लिए प्रावधान भी किये गये। अन्तर्जातिय तथा अन्तधार्मिक विवाह को कानूनी मान्यता देकर जीवन साथी चुनने के हक़ को सामाजिक से व्यक्तिगत निर्णय में बदल दिया गया। लेकिन दुर्भाग्य से जहाँ संविधान में ये क्रांतिकारी प्रावधान किये गये वहीं समाज में ऐसा कोई बड़ा आन्दोलन खड़ा नहीं हो पाया और जाति व धर्म के बन्धन तो मज़बूत हुए ही, साथ ही औरत को भी बराबरी का स्थान नहीं दिया जा सका।

पंचायतों से महानगरों तक प्रेम पर पहरे और कड़े होते गये। इसी के साथ बाज़ार केन्द्रित अर्थव्यवस्था ने प्रेम और औरत को एक बिकाऊ माल (सेलेबल कमोडिटी) में बदल दिया। हालत यह हुयी कि प्रेम की सारी भावनाओं की जगह अब गर्लफ्रैंड-ब्वायफै्रंड बनाना स्टेटस सिममबल बनते गये। क्रीम-पावडर के बाजार ने सुन्दरता के नये-नये मानक (Standard) बना दिये और प्रेम मानो सिक्स पैक और ज़ीरो फ़िगर में सिमट गया। आज के पूँजीबादी दौर में बाजार ने प्रेम को इस तरह प्रायोजित किया है कि वह प्रकृति का सबसे सुन्दर उपहार न लग कर, चैराहे के किसी दुकान पर रखा नकली गुलदस्ता लगता है। जिसमें रंग तो है, पर खुशबू नहीं है। सौंन्दर्य तो है, पर स्निग्धता नहीं है। अत्यंत बनाबटीपन होने के कारण लगाता है, जैसे वह अपना मूल स्वरूप ही खो बैठा है। जैसे किसी स्वच्छंद वन में विचरण करने वाली हिरनी, किसी चिड़िया घर के पिंजड़े में लाकर बंद कर दी गयी है। जिसके परिणाम स्वरूप अब उसकी आँखों में बसी जंगल की आवारगी, थोड़ा भय, बहुत सारा उत्साह मर कर जैसे निरीहता में परिवर्तित हो गया है। ‘वेलेन्टाइन ने प्रेम के लिए बलिदान दिया था पर बाज़ार ने उसे ‘लव गुरू’ बना दिया। इस सारी प्रक्रिया ने मज़हबी कट्टरपंथीं लोगों को प्रेम और औरत की आजा़दी पर हमला करने के और मौके उपलब्ध करा दिये। ये हमले दरसल हमारी संस्कृति और लोकतंत्रिक अधिकारों पर हमला हैं।

इसके प्रति सचेत होना प्रेम के वास्तविक स्वरूप को समझना है।

मोबाइल : 9893375309
Email : jitendra.visariya@gmail.com

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