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आँखों में प्यार ही प्यार बेशुमार

News Editor Friday 21st of August 2020 at 09:11:28 AM Blog
आँखों में प्यार ही प्यार बेशुमार

अरावली पहाड़ी की तलहटी में विद्यमान ज्ञान केन्द्र जेएनयू की बड़ी-बड़ी चट्टानों, कंटीली झाड़ियों, घुमावदार राहों के बीच बने विभिन्न विषयों के स्कूल अद्भुत आकर्षण पैदा करते हैं। सघन वृक्षों के झुरमुटों के किस मोड़ पर कौन सा सेमिनार हॉल, कौन सी छोटी ईटों वाली बिल्डिंग की पोस्टर लगी दीवार आपके चक्षुओं के समक्ष आ जाये नहीं मालूम। पोस्टर लगी दीवारें, वार्तालाप का लहज़ा, हक़ हुक़ूक़ की आवाज़ की बात हो, पृथक विचारधाराओं की या फिर उच्च श्रेणी के एकेडमिशियन प्रत्येक क्षेत्र में अग्रणीय स्थान रखता है जेएनयू। डॉ. ख़ुशी की करीबी मित्र जो जेएनयू में प्रोफ़ेसर हैं, जिनके साथ वह सोशल मीडिया के माध्यम से बातें किया करती थी। आज पहली बार इसी विश्वविद्यालय की कॉन्फ्रेंस में वो उनसे मिलीं। जहां वो बतौर वक्ता ‘भारतीय जातीय व्यवस्था के बीच दम तोड़ता प्रेम’ विषय पर बोलने गई हुईं थीं।

वक्तव्य समाप्ति के बाद दोनों पास वाले गंगा ढाबे पर गई। और ब्लैक कॉफ़ी का ऑर्डर किया। अपने ही विचारों में जा कर प्रोफेसर तान्या कहीं गुमसुम सी हो गई। उन्हें देख सामने बैठी डॉ. खुशी ने अपने मोबाइल से नज़र हटा, उनके चेहरे पर नज़र ठहराते हुए गम्भीर मुद्रा में एक प्रश्न दाग दिया,"यार, आप कहाँ खो गई?" उनके चेहरे पर शिकन और मायूसी की रेखाएं उभर आईं थीं। उन्हें समझते हुए तनिक भी देर नहीं लगी कि कुछ तो है जो सूरत का रंग उड़ा ले गया। ‘अरे डॉक्टर साहिबा, कुछ भी तो नहीं हुआ बस ऐसे ही अतीत के अन्धकारमयी जंगलों में मन अबोध जीव सा क्षण भर के लिए भटक गया।’ उन्होनें टेबल पर रखे उनके गौरवर्णी हाथ को सहजता से अपने हाथों से पकड़ते हुए कहा ‘दोस्त चेहरा हृदय का प्रतिबिंब दिखा देता हैं।’ उन्होंने अपनी फीकी हंसी से बात टाल दी, ‘बस ऐसे ही कोई ख्याल आ गया।’ ‘क्या आप हमें नहीं बताना चाहती?’ ‘नहीं ऐसी कोई बात नहीं है।’ ‘चलिये कोई नहीं आपकी मर्ज़ी।’

उधर ढाबे वाले की आवाज़ आई ‘दो ब्लैक कॉफ़ी’ और तान्या कॉफ़ी लेकर आ गई। कंठ से कॉफी के घूंट उतारते हुए पूछा, ‘‘अच्छा, आपके जेएनयू में तो इतनी वैचारिकता है तो जातिवाद का इशू शायद ही संबंधों के आड़े आता होगा?’’ प्रोफेसर तान्या को जैसे बात करने का बिन्दु मिल गया। उसने गहरी लंबी सांस लेते हुए कहा, “आपने कुछ देर पहले मुझसे जो सवाल किया था कि मैं ख़मोश क्यों हूँ? तो सुनिये!” उन्होंने कॉफ़ी कप टेबल पर रख अपनी निगाहों को सामने वाले गोल पत्थर पर केन्द्रित किया। ‘मैं और राहुल लंबे अरसे तक दोस्त थे। एक ही हॉस्टल में रहना, खाना- पीना, पढ़ना सब एकसाथ। वो हॉस्टल की लेफ़्ट विंग में था तो मैं राईट विंग में। दोनों साथ-साथ एक ही सब्जेक्ट में पीएच.डी. कर रहे थे। शोध के दौरान एक-दूसरे के प्रश्नों का जबाव खोजना और सन्दर्भ इकट्ठा करने में सहायता भी किया करते थे। वो दलित विमर्श की कहानियों पर शोध कर रहा था। एक दिन उसने कहा कि दलित साहित्य में स्वानुभूति और सहानुभूति के खेमे क्यों बनें, मेरी तो समझ में नहीं आता? वही रोना-पीटना गाली-गलौच मुझे कुछ खास नहीं लगता। मैंने तुनकते हुए कहा, तुमने भोगा होता तो जानते न, तुम्हें हमेशा अपनी जाति का प्रिविलेज मिला है। देखो, मैं सवर्ण हूँ और तुम अनुसूचित जाति से, क्या कभी मैंने तुम्हारी कास्ट पता की। क्या हमारे बीच कास्ट आई? नहीं ना। वैसे भी संविधान ने सब कुछ दे ही दिया है तो शोध कर गड़े मुर्दे उखाड़ने की क्या जरूरत है? मैंने मुंहतोड़ जबाव दिया संविधान ने दिया है, न कि तुम्हारे जातिवादी समाज ने। यार, मैं हमेशा प्यार से बात करता हूँ तुम काटने दौड़ पड़ती हो। वैसे भी तुम नीची जाति की नहीं लगती। और ऐसा कहकर वह ज़ोर से हँसने लगा। ख़ुशी जी, हम हमेशा ही शाम में जब भी कॉफ़ी पीने आते थे तो इसी सामने वाले गोल पत्थर पर बैठा करते थे।”

डॉ. ख़ुशी ने आंखों के इशारे से कॉफी की तरफ़ इशारा कर ठंडा होने का अहसास कराया। दूसरी सिप लेते हुए मन में कॉफ़ी की चुस्कियों का चस्का कम था उस बेजुबान पत्थर को अपलक देखने का अधिक चस्का था। अपनी बात को जारी रखते हुए तान्या ने कहा, “उस दिन क्षितिज के मेघों ने अचानक घुमड़  बरसकर दो हृदयों को आर्द करने कि योजना बना ली थी। हम अपनी कॉफ़ी को ख़त्म कर निकले ही थे कि बारिश की रिमझिम खनकती बूंदों ने रोमांटिक मौसम का आगाज़ कर दिया। ढाबे से सड़क के बीच दस कदम तक कच्ची मिट्टी का ये जो सामने से रास्ता दिख रहा है, वहीं मेरा पैर स्लिप हो गया और मैं फिसल गई थी और उसने मुझे अपनी मजबूत बाहों में थाम लिया। हम दोनों के नैनों में मोहकता तैरने लगी। दोनों एक-दूसरे को अपलक देखें जा रहें थे, तकरीबन बीस मिनट की तेज़ बारिश में हम पूरी तरह भींग चुके थे, नभ में चंचला चपला बिजली कड़की तो मैं भयभीत हो गई और उसके सीने से जा लगी। मुझे ठंड से थरथर कांपते देख उसने फ़िर से कॉफ़ी पीने की सलाह दी। मैं वापिस जाकर कुर्सी पर बैठ गई उसने मशीन वाली दो कप कॉफी लाकर टेबल पर रख दी और एक कप गर्मागर्म कॉफी मेरे कंपकपाते हाथों में थमा दी। कॉफ़ी पीते वक़्त उसकी निगाहों में बेशुमार प्यार झलक रहा था। मैं पलकें नीची किये जल्दी-जल्दी कॉफ़ी के घूँट पीते हुए उसे देख रही थी कि तभी उसने शरारती अंदाज में कहा सुनो तुम्हारा ये सौंदर्य मुझे तुम्हारी ओर खींचें जा रहा है, बारिश से सलवटी तुम्हारा शरीर और उसपर भी उपर से चाँद जैसे मुख की श्यामल अलकों पर बारिश की टपकती हुई बूँदें मुझे मुझसे ही दूर ले जा रही हैं। उसने मेरा हाथ कस पकड़ा और हसरत भरी निगाहें मुझ पर जमा दी ‘आई लव यू तान्या’ कहकर उसने अपने ओठों को किस करने के लिए जैसे ही मेरी तरफ़ बढ़ाया, मैंने ठेलते हुए कहा नहीं, यदि हमारी शादी होगी तो ही मैं ये सब करूँगी। उसे ये बात चुभ गई और मुझे यहीं इसी शिलापट्ट पर अकेले छोड़ गया और फिर कभी भी पीछे मुड़कर नहीं देखा। मैं, कॉफ़ी और ये शिलापट्ट कई सालों तक उसकी राह तकते रहे। वो अपने शहर बनारस चला गया और वहीं असिस्टैंट प्रोफेसर बन गया। एक बार मैंने अपने असिस्टैंट प्रोफेसर बनने की खबर सुनाने के लिए उसे कॉल किया तो उसने बड़ी ही बेरूखी से बधाई दी और एक उलाहना दिया कि आख़िर आरक्षण ने हमारे बराबर बना ही दिया और फोन डिस्कनेक्ट कर दिया।”

डॉ. ख़ुशी ने गहरी लंबी साँस छोड़ते हुए, अपनी कॉफ़ी के आखिरी घूंट को ख़तम करते हुए मौन तोड़ा, “वैसे भी  रेत के बनाये घरौंदे ढह जाते हैं, डॉ. तान्या।” हड़बड़ी में तान्या के कप में बची ठंडी कॉफी हाथ लगने से नीचे गिर गई। ‘काफ़ी वक़्त हो गया मैं निकलती हूँ, बाय, फिर मिलते हैं किसी राह में किसी मोड़ पर।’ उसने गाड़ी स्टार्ट की और निकल गई।

 लेखिका - डॉ. राजकुमारी

(लेखिका दिल्ली विश्वविद्यालय के जाकिर हुसैन दिल्ली कॉलेज (सांध्य) में हिंदी प्रवक्ता हैं। ये किस्सा लेखिका के विभिन्न किस्सों के संग्रहइश्क़--कॉफ़ीका चौथा किस्सा है। लेखिका की इससे पहले ‘दर्द-ए-लफ्ज़’ शायरी संग्रह काफी चर्चित रहा। चार पुस्तकों की लेखिका विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में अनवरत लेखन कार्य करती रहती हैं।)

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