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मैम आपका मग नीचे रख आऊँ

News Editor Thursday 13th of August 2020 at 08:04:31 AM Blog
मैम आपका मग नीचे रख आऊँ

वो कॉफ़ी ही तो थी जो इतराती हुई डॉ. ख़ुशी की अंगुलियों की गिरफ़्त में लिए हुए प्याले के किनारों से टकराती रहती थी। वो कॉफ़ी ही थी जो हर सुबह डॉ. ख़ुशी के दिल की दहलीज़ पर दस्तक दे देती थी और फिर उसके घर के किचन से लेकर जहाँ -जहाँ वह जाती थी वहाँ-वहाँ नवविवाहित माशूक की भांति साथ जाती। घर की टेबल पर रखीं पुस्तकें, कलम स्टैंड, नोट पेड और उसकी डायरी ऐसे प्रतीत होते मानों कॉफ़ी कप से आपसी गुफ़्तुगू कर रहे हों और कॉफ़ी के दीदार को तरस रहे हों। स्टडी रूम की चारदीवारी, यूनिवर्सटी की पत्थरों वाली बैंच से लेकर, धरती के स्वर्ग कश्मीर तक एक नया किस्सा गढ़ती प्रोफेसर ख़ुशी की जिगरी यार, माशूक सी थी कॉफ़ी। यूँ तो किस्सागोई के ताने-बाने में रेशम सी यादों के बहुत किस्से हैं। ये भी उन्हीं में से एक किस्से  का हिस्सा है।

दिल्ली विश्वविद्यालय के एक सांध्य कालेज में हिंदी की प्रवक्ता हैं ख़ुशी। कालेज में ही तमाम शामें गुज़रती हैं। जब सुरमई शाम में परिंदे निकटस्थ मस्जिदों की अज़ान सुन अपने नीड़ो में लौटने लगते हैं। हफ़्ते के हर दिन अपनी क्लास ओवर कर दूसरी, तीसरी कक्षा में वह बैक टू बैक तीन कक्षाओं में जाती है। थर्ड फ्लोर की गैलरी से कॉलेज के टेरेस पर खिलखिलाते, पक्षियों से चहकते स्टूडेंट्स को देखती है। उसके आने-जाने का रास्ता रॉक गार्डन हैं क्योंकि गाड़ी की पार्किंग है। आते-जाते वक़्त बच्चे नमस्ते, दुआ सलाम कर लेते हैं। कभी-कभी वह जब ब्रैक में कनॉट प्लेस किसी पुस्तक विमोचन या खास शाम के किसी प्रोग्राम में जाती है तो रॉक गार्डन में शाम की नमाज़ का वक़्त होता है, नमाज़ अदा करते छात्रों के दुआ के लिए उठते हाथों का मनोरम दृश्य भी उसे खूब लुभाता है।

आज वह गाड़ी से उतर रॉक गार्डन से बीच में छोटे से गार्डन जिस के बड़े वृक्षों की शाखाओं पे मनी प्लांटों की गहरी, हल्की हरे रंग की वल्लरिया शोभायमान हैं, जहाँ कटे पेड़ो से बैठने के मुड्डा टाइप जगह बनी हुई है। कॉलेज का सबसे बेहतरीन और हरे नूर से सुसज्जित स्थान वही है। वहीं से लिफ़्ट क्रॉस कर स्टाफ रूम का दरवाज़ा खोल तेज़ कदमों से घुसती है। अपने निर्धारित विभागीय स्थान वाले सॉफे पर पर्स रख छोटी पॉकेट से चाबी लें, लॉकर से बुक्स वाला फ़ोल्डर निकाल, पुनः आ सोफ़े पर बैठ गई। चूंकि अभी शाम के साढ़े तीन बजे हुए थे। कक्षा लगने में आधा घंटा शेष है तो वह मोबाइल पर मेसेज चैक करने लग जाती है। रूम की दीवार पर लगे वॉलक्लॉक को गर्दन उठा कर देखा तो 3.50 का समय हो रहा था। वह सोफे से उठ स्टाफ रूम में बने किचन की ओर गई। हसन ने गैस चूल्हे को ऑन करके एक तरफ़ बड़े पतीले में गर्म पानी, दूसरी तरफ दूध उबलने को छोड़ रखा था और अपने रसोईघर के कार्य को समेटने में व्यस्त था। ख़ुशी ने हसन से विनम्रतापूर्वक कॉफ़ी के लिए निवेदन किया। हसन ने अपने काम की तन्मयता को भंग करते हुए कहा, “रुकिए देता हूँ।” डॉ. ख़ुशी ने कहा, “जल्दी दो, क्लास का टाईम हो जायेगा और तुम्हें तो पता है कॉफ़ी नहीं पी पाऊँगी तो लगातार एक के बाद एक, तीन लेक्चर देना मुश्किल हो जायेगा।” हसन ने मुस्कुराकर डॉ. ख़ुशी को देखते हुए कहा, हाँ, मैम वो तो है एनर्ज़ी तो चाहिए। उसने डॉ. ख़ुशी के हाथ में ब्राउन कॉफ़ी जिसके थोड़े से झाग किनारे से सटे और उठती भांप के छल्लों वाले मग को हाथ में थमा दिया।

वह फुर्तीले कदमों से स्टाफ रूम के दरवाज़े की ओर लपकी उसके दोनों हाथ रिजर्व एक में फ़ोल्डर एक में कॉफ़ी मग तभी उनके कॉलेज के वरिष्ठ कलीग शौकत अली साहब की आवाज़ कानों में पड़ी, “रुकिए मैडम, हम खोल देते हैं।” उसकी कटारी सी आँखें और सुर्ख लाल लब दोनों थैंक्स कह रहे थे। गैलरी से लिफ़्ट की दूरी दस -पंद्रह कदम ही होगी। देखते ही देखते लिफ़्ट का दरवाज़ा बंद हो रहा था और वह बाहर बेबस सी खड़ी लगातार ‘रोको-रोको, खोलो-खोलो’ चिल्लाने लगी जैसे वो लिफ्ट सिमसिम दरवाज़ा है और वह अलीबाबा है और उसके कहते ही लिफ़्ट का दरवाज़ा खुल जायेगा। लिफ़्ट वाले भईया ने उसे देख लिया था वो हँसने लगे। लिफ़्ट वाले भैया मैम आप को देख लिया था मैंने। आपकी आवाज़ सुनी तो पैर दरवाज़े पर लगा दिया। लगता है आज आपकी लगातार क्लास हैं तभी कॉफ़ी मग हाथ में है। हाँ भैया, वरना कॉफ़ी क्लास में कहाँ पी पाती हूँ। मुझे ऑड भी लगता है स्टूडेंट्स के आगे कॉफ़ी पीना। पचास बच्चे मुझे ताके मैं कॉफ़ी पीती पढ़ाती रहूँ।

अब वो थर्ड फ्लोर पहुँची, गैलरी से कमरों में अपनी तिरछी सरसरिया नज़रें दौड़ाते हुए अपने रूम में एंटर कर गई। बच्चों का सामूहिक स्वर गुड ईवनिंग मैम। ख़ुशी अपने कॉफ़ी मग को लेक्चर स्टैंड पर रखते हुए देख रही है कि दो स्टूडेंट्स जो बिल्कुल पीछे की बैंच पर बैठे हुए हैं एक दूसरे की नज़रों में इस कद्र उलझे हुए हैं कि उन्हें होश ही नहीं था कि टीचर क्लास में आ गयी है।

डॉ. ख़ुशी टकटकी लगा देखने लगी। उन्होनें उस प्रेमी युगल के बुलबुल से रोमांचक बिम्ब की धज्जियाँ ये कहकर उड़ा दी ‘वाह मेरे प्यारे लविंग बर्ड’ और क्लेपिंग करने लगी। उन्हें खड़े होने को कहा। तो सभी पीछे मुड़ देखने लगे और ठहाका लगाकर हँस पड़े। लड़का- लड़की शर्म से इतने लाल हो गये कि आँखें ज़मीन में गड़ा ली। डॉ. ख़ुशी ने फ़िर सभी को फटकार दिया। फ़ोल्डर से क़िताब निकालकर पढ़ाना आरम्भ किया। पढ़ाते हुए ध्यान आया कि वो दोनों स्टूडेंट्स तो खड़े ही हैं। उन्होनें नज़रें उठा राइट हैंड से बैठने का इशारा किया। पढ़ाते वक्त एक चुलबुले स्टुडेंट की आवाज़ आई ‘मैम आप बहुत सुन्दर लग रहीं हैं।’ वह उसकी बात पर ज़ोर से हँसने लगी क्यों पढ़ना नहीं आज? हँसी कंट्रोल करते हुए उसको देखने लगीं। ‘नहीं, मैम ऐसा नहीं हैं, आप से कौन नहीं पढ़ना चाहता। बस सोचा बोल दूँ फ़िर आप पढ़ाने लग जाओगे।’ अच्छा चलो, ओके। कम से कम टीचर बच्चों को खूबसूरत तो लगी, नहीं रील लाईफ के ही दीवाने हुए जा रहे हैं आजकल के बच्चे तो। ‘नहीं मैम, खूबसूरत तो आप रोज़ लगते हैं, पर आज ज्यादा सुन्दर लग रहे हो। तपाक से बोले तो सुभानअल्लाह।’ डॉ. साहिबा ‘ओके ओके धन्यवाद।’ अब वो क़िताब में आँखें गड़ा लेती है और आज घनानंद पढ़ाने लगती है। तभी सुशांत बीच में बोल पड़ता है मैम आप कॉफ़ी पी लीजिए ठंडी हो जायेगी।

अब उनके मन की बात और इरादे उसने भांप लिए थे कि आज ये बच्चे शरारत करने के मूड में हैं। आदतन डॉ. ख़ुशी चेहरे पर हल्की मुस्कान लिए हुए घनानंद की पंक्तियों को स्वरबद्ध करने लगी। रावरे रुप की नीति अनूप नया नया लागे जो जो निहारिये.....।

कॉफी की सिप लेते हुए लबों की लाली हमेशा ही उसके कॉफ़ी मग के किनारे के बाह्य हिस्से पर निचले अधर के निशान छोड़ देती है। कभी सुर्ख लाल लिपस्टिक का तो, कभी गुलाबी कॉफ़ी कलर के निशां, जो कॉफ़ी से बेइन्तहां इश्क़ के किस्सों में हैं। उसकी अनवरत चलती कक्षाओं में कॉफ़ी मग में चार पाँच शिप हमेशा छूट जाते हैं अधूरे इश्क़ से। ऐसे में वो पंक्तियाँ याद हो आती हैं कि वो इश्क़ ही क्या जो पूरा हो जाये। सुजान घनानंद का प्रेम हों या लैला मजनूं या अन्य प्रेम कथाएँ अधिकतर पराकाष्ठा वाला प्रेम भी विरह संतप्त ही रहता है। प्रेम जहाँ है पीर भी वहीं है।

जब वो घनानंद के काव्य की व्याख्या कर रही थी कि तभी उसे पीछे से कक्षा में खुसर-पुसर की ध्वनि सुनाई दी जो सामान्यतः होता है परन्तु उन्हें पीछे बैठ बच्चों का हँसना उसे पसंद नहीं आया। बच्चों को टोककर वह फ़िर समझाने लगी, सुजान से घनानंद इतना प्रेम करते थे कि उनके दर्शन को घनानंद की अखियां व्याकुल ही रहा करती थीं। कवि घनानंद के काव्य में प्रेम की पराकाष्ठा दृष्टव्य होती हैं। वे प्रेम व्यंजना के कवि हैं। उनके सुजान के मध्य आत्मिक प्रेम था। तभी आदित्य मैम एक बात पूछनी है। ‘हाँ , कहो।’ आदित्य क्या कोई किसी से इतना प्रेम कर सकता कि एक ही व्यक्ति का सौंदर्य, रूप प्रतिदिन देखने पर नवीन लगने लगे या ये सब कवियों की कल्पना ही है मैम? डॉ. ख़ुशी ने बच्चे की जिज्ञासा का सन्तुष्टिपूर्ण उत्तर देने कि कोशिश करते हुए कहा, “संभव है, प्रेम यदि वास्तव में हो जाये तो छूटता नहीं। हाँ, आकर्षक हो तो एक के बाद एक हो सकता है। वो प्रेम नहीं। केवल टाइम पास है जैसे तुम लव बर्ड बने शाम क्लास की बजाय टेरेस पर गुजारते हो वो प्रेम नहीं है। बहुत बार आपकी जाति, साम्प्रदायिकता, अमीरी-ग़रीबी, वैचारिकता आड़े आ जाती है। हमारे आस-पास भी ऐसे अनेक कपल दिखाई देते हैं जिन्हें लगता है कि वो सब सामाजिक बंधनों को ठुकराकर शादी करेंगे। वो आधुनिक हैं, रीति-रिवाज़ तोड़ेंगे पर अंत में सामाजिक, साम्प्रदायिक नियम उस प्रेम के गुब्बारे की हवा निकाल ही देते हैं। चूंकि वो उत्साह, जोश, कल्पना में लिए गये यौवनमद के चूर फ़ैसले हैं, परिपक्वता जैसा कुछ भी नहीं होता। उस उम्र में सभी धरातलीय सच से अनभिज्ञ होते हैं। सच कहूँ तो उत्साह में लिए फैसलों को सामाजिक सच के सामने मजबूरन घुटने टेकने पड़ते हैं।”

डॉ. ख़ुशी अक्सर समकालीन उदाहरण देकर विद्यार्थियों को समझाती थी ताकि उन्हें जल्द चीज़े समझ आ जायें। वह प्रश्न का उत्तर दे ही रही थी कि आदित्य के बग़ल वाला लड़का हाथ ऊपर खड़ा कर लेता हैं। ख़ुशी ने अपनी बात की समाप्ति पर ‘हाँ कहो’ कहा। ‘मैम, क्या प्रेम हम उम्र से ही होता है या किसी से भी हो सकता है। मतलब उसमें उम्र की लिमिटेशन भी होती है मुझे लगता है नहीं होती।’ तभी पीछे से ‘यार मैम से कैसा सवाल कर रहा हैं। फ़िल्म देखी थी शाहरुख ख़ान की जिसमें सुष्मिता से प्यार हुआ था जबकि वो टीचर थी।’ ख़ुशी लेक्चर स्टेंड पर कोहनी टिका हथेली पर ठोढ़ी रख मौन मुद्रा में खड़ी, आँखें बड़ी कर, उस बच्चें को देख औऱ सुन रही थी। उसने आमिर को कहा ‘चुप हो जाओ, आगे पढ़ते है। अब कोई प्रश्न नहीं।’ ‘पर मैम आप बताओगे तो ठीक से समझ आयेगा।’ उसने कहा सलमान ने बताया तो प्रेम उम्र नहीं देखता और प्रेम में कोई बाध्यता नहीं क्योंकि प्रेम मन का भाव है।

ट्रिन ....ट्रिन .... कॉलेज में क्लास बदलने की घंटी बजती है। लेक्चर का वक़्त समाप्त हो गया। शाहरुख कहता है ‘मैम आपका मग नीचे रख आऊँ।’ ‘नहीं, मैं लास्ट क्लास के बाद लेती जाऊँगी।’ ‘पर मैम इसमें कॉफ़ी पड़ी है आप कहाँ इसे लें जाओगे।’ चलो रख आओ। ख़ुशी ने मग वही छोड़ दिया। शाहरुख की आँखें चमक सी गई । ‘मैम, आपके मग पर वैसे ही लिपस्टिक के निशान हैं जैसे उस गाने में एक लड़की कॉफ़ी पीने एक ही कॉफ़ी हाऊस जाती थी और वहाँ एक वेटर बॉय उसे कॉफ़ी सर्व करता और उन लिपिस्टिक वाले कॉफ़ी कप्स को अपने लॉकर में जमा कर लेता था।’ वह जोर से हँस पड़ी। बाकी बच्चें जो बाहर अगली कक्षा के लिए जा रहे थे वो भी रुक हँसने लगे। ख़ुशी ने चुटकी लेते हुए कहा, “तुम भी मेरा मग लें जाओ। अपने घर, कॉलेज़ में तुम्हारे लिए लॉकर तो है नहीं।” ‘नहीं मैम, आप रोज़ नया थोड़ी लाओगे। नवनीत मैम बस नीचे तक देखता चला जायेगा बहुत हैं इसके लिए।’

ख़ुशी, “हटो, तुम सब तो पागल हो, बातें बनवा लों तुमसे। चलो तुम्हारे सर आ गये होगें। मुझे भी अपनी क्लास लेनी है।” शाहरूख तब तक कॉफ़ी मग रखने जा चुका था। वह भी बेग फ़ोल्डर लिए गैलरी से लिफ़्ट की ओर शीतल पवन के तेज झोंकों सी मन ही मन मुस्कराती हुई अगली कक्षा में चली गई।

लेखिका - डॉ. राजकुमारी

(लेखिका दिल्ली विश्वविद्यालय के जाकिर हुसैन दिल्ली कॉलेज (सांध्य) में हिंदी प्रवक्ता हैं। ये किस्सा लेखिका के विभिन्न किस्सों के संग्रह “इश्क़-ए-कॉफ़ी” का प्रथम किस्सा है। लेखिका की इससे पहले ‘दर्द-ए-लफ्ज़’ शायरी संग्रह काफी चर्चित रहा। चार पुस्तकों की लेखिका विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में अनवरत लेखन कार्य करती रहती हैं।)

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