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पेरिस से आया मेरा दोस्त

News Editor Saturday 15th of August 2020 at 06:50:47 PM Blog
पेरिस से आया मेरा दोस्त

फ्रांस की राजधानी पेरिस में जाकर, वहाँ की आकर्षक इमारतें घूमकर पेरिस का फैन हो जाना कोई अचम्भित करने वाला प्रसंग नहीं। आज के किस्से में अद्भुत, अनोखी बात यही है कि आप अपने ही देश में बैठे-बैठे ब्रह्मांड में दोस्ताने जैसे रिश्तों में निश्छल भाव, करुणाशील, स्नेही मित्र बना लेते हैं।

डॉ. ख़ुशी अभी घर से कॉलेज जाने के लिए गाड़ी में बैठी ही थीं कि अचानक से डॉ. गौतम का कॉल आ गया। फोन वाइब्रेट हुआ, अपनी साइड से फोन पिक करते हुए ख़ुशी ने कहा, ‘हेलो डॉ. साहब कहिये, कैसे हैं?’ ‘बढ़िया हूँ मैम आप बताओ? सब ख़ैरियत। मैम आज हम आपको नये मेहमान से मिलवायेंगे’ डॉ. गौतम ने अपनी मधुर एक्साइटिड आवाज़ में कहा। ‘अरे वाह, कौन हैं वो?’ ‘जी, पेरिस से आये हैं, हमारे दोस्त हैं, दिल्ली विश्वविद्यालय के बुद्धिस्ट विभाग में पीएच.डी. शोधकार्य की जानकारी करने के सिलसिले में इण्डिया आए हुए हैं।’ ‘बहुत बढ़िया, चलिये डॉ. साहब, आइए मिलते हैं कालेज में।’ ‘जी, मैम।’

डॉ. ख़ुशी के मन में औत्सुक्य था पेरिस के मित्र से मिलने का। डॉ. गौतम के माध्यम से यद्यपि वे पहले भी कई विदेशी अभ्यागतों और विद्वान-विदुषियों से मिल चुकीं थीं, किन्तु फ्रांस से ये पहला इंसान था जिससे डॉ. खुशी मिलने वाली थी। ड्राइवर कार चला रहा था और डॉ. ख़ुशी एक अलग ही दुनिया में खो चुकी थी। वो अपने कॉलेज के दिनों को याद करने लगी। जब वो अपनी सहेलियों के साथ बैठे-बैठे कैंटीन में कॉफ़ी पीती थी तो सभी अपने-अपने पसंदीदा पर्यटन स्थलों के बारे में बात करती थीं। सबके स्थल समय के साथ बदलते रहे किन्तु ख़ुशी हमेशा से पेरिस की दीवानी थी। पेरिस की बड़ी-बड़ी इमारतें, एफिल टॉवर, सैक्रे कोएर, ल्युव्रे म्यूज़ियम, डिज़्नीलैण्ड, लक्जमबर्ग गार्डन उसे हमेशा से अपनी ओर खींचते थे। खुशी का सपना था कि पेरिस की सीन नदी के किनारे वाली किसी कॉफ़ी शॉप में बैठकर कॉफ़ी पिए और बस हर आते-जाते जहाज को निहारते रहे।

आज जैसे ही डॉ. गौतम ने पेरिस से आए हुए दोस्त से मिलवाने का जिक्र किया तो डॉ. ख़ुशी अपने अतीत में सीन नदी किनारे बैठकर कॉफ़ी पीने के ख्वाब में खो गई। ड्राईवर ने कहा, ‘मैडम, कॉलेज आ गया।’ डॉ. ख़ुशी सपनों से निकलना नहीं चाहती थी किन्तु ड्राईवर के शब्द उसके कर्णपटह से टकराए और अचानक से वो वर्तमान जीवन में आ गई। स्टाफ रूम में जाकर कुछ देर प्रतीक्षा करने के बाद डॉ. ख़ुशी, डॉ. गौतम को कॉल करती है, तो गौतम ने बताया कि वे थोड़ा विलम्ब से आएँगे। डॉ. ख़ुशी क्लास में चली गई।

आज डॉ. ख़ुशी की अंगुलियों की गिरफ़्त में कॉफ़ी का मग नहीं था। आज उसने प्लान किया था कि कॉफ़ी पेरिस वाले मित्र के साथ ही पिएगी। क्लास समाप्त होने से ठीक पाँच मिनट पहले डॉ. गौतम ने सूचना दी कि वो स्टाफ रूम में है। क्लास खत्म करके वो नीचे आई, तो डॉक्टर साहब ने उनका परिचय पेरिस के मित्र फोंग से करवाया। परिचय के बाद भारतीय परम्परा के अनुसार चाय-कॉफी....स्स्स....सॉरी कॉफी...क्योंकि डॉ. ख़ुशी की डिक्शनरी में तो एकमात्र शब्द है कॉफ़ी तो कॉफ़ी ऑर्डर कर दी गई।

डॉ. ख़ुशी की ख़ुशी का ठिकाना नहीं रहा जब उसे पता चला कि फोंग भी उसी की तरह कॉफ़ी लवर है। डॉ. गौतम तो फ्लेक्सिबल इंसान हैं और उन्हें किसी भी पेय पदार्थ से परहेज़ नहीं है। ब्लैक टी, ग्रीन टी, लेमन टी, मिल्क टी या कॉफी जो कुछ भी हो उन्हें सब अच्छी लगती थीं। अक्सर खाली पीरियड में डॉ. ख़ुशी और डॉ. गौतम दोनों जब साथ बैठते थे तो कॉफ़ी ही पीते थे।

डॉ. गौतम से उनके विद्यार्थियों का खूब प्रगाढ़ रिश्ता है क्योंकि वो न केवल शार्प माइंड हैं अपितु इग्नाईटेड माइंड हैं। किसी भी विभागीय या बाह्य कार्यक्रम में, मोटिवेशन में, विषय के चुनाव में, निजी सलाह में भी वे सभी बच्चे डॉ. गौतम से ही विचार-विमर्श करते थे। उनके गहन चिंतन-मनन की समझ उन्हें कहीं न कहीं से मार्ग सुझा ही देती है। देखते ही देखते स्टूडेंट्स का हुजूम बढ़ गया। ये सुखद अनुभव रहा तभी एक और घनिष्ठ मित्र डॉ. फ़ातिमा जो दोनों की करीबी दोस्त थी उन्हें भी बुला लिया।

फोंग एक के बाद एक पेरिस की कहानियाँ सुना रहा था, वहाँ के पर्यटन स्थलों का ज़िक्र कर रहा था और डॉ. ख़ुशी हर उस किस्से में अपने स्वप्नों को बुन रही थी। एक-एक और कॉफ़ी का ऑर्डर दिया गया। डॉ. ख़ुशी बस इंतज़ार कर रही थी कि कब फोंग उसकी पसंदीदा सीन नदी का ज़िक्र करेगा। जैसे ही फोंग ने सीन का किस्सा बताना शुरू किया तो डॉ. ख़ुशी की आंखों में चमक आ गई। पुतलियाँ फैल गईं और हृदय में बस एक ही भाव था कि सीन नदी किनारे से कोई अपना सा आ गया, डॉ. ख़ुशी को लग रहा था कि उसके लिए तो पेरिस ही भारत में आ गया।

फोंग को डॉ. ख़ुशी, डॉ. गौतम, डॉ. फ़ातिमा और छात्रों ने पूरा कॉलेज घुमाया और कुछ बेहतरीन पलों को कैमरों में कैद कर लिया। वो चित्र जब कभी कॉफ़ी पीती हुई डॉ. ख़ुशी देखती है तो सीन नदी उसका पीछा नहीं छोड़ती। कॉफ़ी से आरम्भ हुई ये बातचीत और मेल-मिलाप दोस्ती में तब्दील हो गई। दो तीन घंटे की इस मुलाकात ने एक अज़नबी मेहमान से जो सात समुन्द्र पार से यात्रा करके आया से कॉफ़ी ने अटूट दोस्ताना संबंध स्थापित करवा दिया, जिससे साबित हुआ कि कोई रिश्ता करीब होने का मोहताज़ नहीं होता। दूसरे दिन कॉलेज की छुट्ठी थी तो डॉ. ख़ुशी ने डॉ. गौतम और फोंग को लंच पर अपने घर आमंत्रित कर लिया।

डॉ. ख़ुशी आज सुबह से लंच की तैयारी में लगी हुई थी। उसके बच्चे और पति भी उसको पूरा सहयोग कर रहे थे। कभी किचन तो कभी दरवाजे पर जाकर देखती डॉ. ख़ुशी अतिउत्साहित थी और बेसब्री से अपने विशेष गेस्ट्स का इंतज़ार कर रही थी। बेहतरीन भारतीय व्यंजन बड़े ही स्नेह से डॉ. ख़ुशी ने अपने हाथों से पकाए थे। दरवाज़े की घंटी बजी तो दौड़ते हुए डॉ. ख़ुशी गई तो सामने फोंग, डॉ. गौतम  और उनके दो प्रिय छात्र खड़े थे। सभी ने रुचि लेकर भोजन किया। डॉ. गौतम हंसमुख स्वभाव के इंसान है तो उन्होंने पेरिस के फोंग को रोटी सब्ज़ी की बाइट बनाकर ख़ाना सिखाया, इस क्रिया पर सभी हँसने लगे और चटखारे लें लज़ीज व्यंजनों का लुत्फ उठाया।

भोजन के बाद फोंग ने चॉकलेट फ्लेवर वाली फ़्रेंच कॉफी डॉ. ख़ुशी को थमाते हुए कहा, “दिस इज फॉर यू एंड दिस कॉफ़ी परचेज्ड फ्रॉम द शॉप लोकेटेड एट द बैंक ऑफ सीन रिवर (ये आपके लिए है और ये कॉफ़ी सीन नदी के किनारे स्थित दुकान से खरीदी गई है।)

डॉ. ख़ुशी का मन भावविभोर हो गया। उसका सीन किनारे बैठकर कॉफ़ी पीने का सपना भले पूरा नहीं हो पाया था, किन्तु आज स्वयं सीन नदी के कॉफ़ी शॉप की कॉफ़ी चलकर सात समन्दर पार उसके पास चली आई थी। लोग सच कहते हैं कि किसी भी चीज को बड़ी सिद्दत से चाहो तो कुदरत ऐसा कुछ करती जरूर है कि वो देर-सबेर आपको मिल ही जाती है।

 

लेखिका - डॉ. राजकुमारी

(लेखिका दिल्ली विश्वविद्यालय के जाकिर हुसैन दिल्ली कॉलेज (सांध्य) में हिंदी प्रवक्ता हैं। ये किस्सा लेखिका के विभिन्न किस्सों के संग्रहइश्क़--कॉफ़ीका द्वितीय किस्सा है। लेखिका की इससे पहले ‘दर्द-ए-लफ्ज़’ शायरी संग्रह काफी चर्चित रहा। चार पुस्तकों की लेखिका विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में अनवरत लेखन कार्य करती रहती हैं।)

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