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पद्मा सचदेवा : अलविदा! डोगरी की महादेवी वर्मा!

News Editor Thursday 5th of August 2021 at 08:52:15 PM India
पद्मा सचदेवा : अलविदा!  डोगरी की महादेवी वर्मा!

हिंदी-डोगरी की प्रसिद्ध साहित्यकार पद्मा सचदेवा नहीं रहीं। एक लंबी बीमारी के बाद आज 81 वर्ष की उम्र में उनका निधन हो गया। ...एक जिंदादिल साहित्यकार के रूप में पद्मा जी को मैंने तब जाना, जब मैंने उनके लता मंगेशकर और इस्मत चुगताई इत्यादि पर लिखे ख़ूबसूरत संस्मरण पढ़े। उनकी आत्मकथा बूंद बाबड़ी और उनका उपन्यास 'भटको नहीं धनंजय' पढ़ा। 

'भटको नहीं धनंजय' महाभारत के पात्र अर्जुन की पीड़ा को दर्शाता है, जिसमें अपने शौर्य से वरी पत्नी द्रोपदी को अपने अन्य भाईयों के साथ बाँटना पड़ता है। कभी पुरुष विमर्श की चर्चा हुई तो यह उपन्यास इसमें अवश्य स्थान बनाएगा। 'भटको नहीं धनंजय' की चर्चा भी इसी रूप में खूब हुई थी।

पदमा जी का गद्य अप्रतिम था। एक नदी के बहाव जैसा, कल-कल छलछल करता। जीवन में पाई जिंदादिली और खिलंदड़पन उनके साहित्य और गीतों में भरपूर झलकता था।

17 अप्रैल 1940 को जम्मू से 40 किलोमीटर दूर पुरमण्डल के एक डोगरा परिवार में जन्मी  पद्मा जी के पिता श्री जयदेव शर्मा, संस्कृत के प्रसिद्ध विद्वान थे। उन्होंने लाहौर से डबल एम.ए. एलएलबी किया था और वे मीरपुर कॉलेज में प्रोफ़ेसर थे। ...डोगरी के साथ-साथ पद्मा जी के परिवार में संस्कृत का भी प्रचलन था। लड़कों के साथ लड़कियाँ भी संस्कृत पढ़ती थीं। कहते हैं एक बार घर में शादी थी। पुरोहित नहीं आया। लड़की को संस्कृत के श्लोक पढ़कर विदा करना था। तब इसका जिम्मा उनकी बुआ ने उठाया था  वे जब कोई 9-10 साल की थीं।

 उनके पिताजी का ट्रांसफर जम्मू असेम्बली होकर आ रहा था। वे एक गाड़ी में सवार थे। साथ में एक दुसरीं गाड़ी में उनके एक मित्र। मित्र ने उन्हें सुरक्षा की दृष्टि से अपनी गाड़ी में बैठा लिया। गाड़ी में 25 लाख की एक बड़ी रक़म रखी थी। संयोग से इसकी भनक चोरों को लग गई। उन्होंने रास्ते में चलती गाड़ी पर फायर किया। इस हमले में पद्मा जी के पिता और उसमें सवार एक लड़की एन मौक़े पर ही मारे गए।  पद्मा और उनकी माँ को उनके ताऊ अपने पैतृक गाँव पुरमण्डल ले आए। 

जम्मू के पहाड़ी गाँव पुरमंडल में पहुँचकर पद्मा जी और उनके परिवार की जिंदगी, फिर वैसी नहीं रही। एक साल का छोटा भाई और गर्भवती माँ को छोड़ नहीं रहे पिता के आगे, बालिका पद्मा को उम्र से पहले समझदार हो जाना पड़ा।

पिता के जाने के बाद पद्मा ने अपने खालीपन को भरने के लिए पढ़ाई में मन लगाया। पढ़ाई के साथ-साथ उन्होंने पहाड़ के जीवन को भी करीब से देखा। बकौल रामधारी सिंह दिनकर डोगरी के लोकगीत विलक्षण होते हैं। पद्मा को वहाँ के प्रसिद्ध 'भांखा' लोकगीत सुनना और गाना ख़ूब पसन्द आया। वे उन्हें गाते हुए ढोलक भी ख़ूब अच्छी बजाने लगी थीं। लोकगीत और पद्मा कुछ ऐसी रलमिल गए कि उन्हें गाते हुए कोई कड़ीं भूलती, तो वे तत्क्षण ही उसमें नए शब्द जोड़कर उस गीत को आगे बढ़ा देती थीं।

पढ़ाई के साथ गाने के शौक ने पद्मा को रेडियो की ओर मोड़ा। जब वे आठवीं में थीं तब जम्मू रेडियो शुरू ही हुआ था। नई प्रतिभाओं की खोज में पद्मा सचदेवा को हर रविवार प्रसारित होने वाले प्रोग्राम में बतौर मेहनताना 20 रुपये मिलने लगे। उस समय वह 20 रुपये उनके और उनकी माँ के लिए काफ़ी मददगार साबित हुए। 

रेडियो और मुशायरों में कविता पाठ के चलते पद्मा जी को 15-16 की कम उम्र में ही, काफ़ी सोहरत मिल गई थी। पर उनके पीछे मुसीबतें कम न रहीं। इसी बीच उन्हें ट्यूबरक्लोसिस जैसी घातक बीमारी ने आ घेरा। तीन साल तक वे बिस्तर पर रहीं। बमुश्किल मरते-मरते बचीं।

 पदमा जी जब सेकेंड ईयर में थीं, तब रेडियो के लिए इंटरव्यू दिया। आउट स्टैंडिंग कैटेगरी में सिलेक्शन हुआ। आपको पंजाबी, डोगरी, कश्मीरी, हिंदी, उर्दू और संस्कृत पाँच भाषाएँ आती थीं। रेडियो पर आपका काम चल निकला। 

बीमारी के दौरान ही प्रसिद्ध गीतकार 'सिंह बन्धु' में से गायक सुरिंदर सिंह जी से आपका परिचय हुआ। देखभाल और बढ़े प्रेम ने उन्हें, विवाह की मंजिल तक पहुँचाया। इस तरह लोकगीतों और ढोलक में जान रखने वालीं पद्मा जी और गीतों में ढले सुरेंद्र सिंह की जोड़ी और भी ख़ूब सुरीली हुई ।

जम्मू के बाद पद्मा जी का सफ़र मुंबई की ओर मुड़ा। मुंबई में उनकी मुलाकातें और संगत तब के प्रगतिशील उर्दू साहित्यकार राजेन्द्र सिंह बेदी, कुर्तुलएन हैदर, इस्मत चुगताई इत्यादि के साथ रहीं। उनके प्रगतिशील विचारों को भी उन्होंने आत्मसात किया। उन पर बाद में उन्होंने बड़े ही सुंदर संस्मरण भी लिखे। एनी आपा पर लिखा उनका संस्मरण, 'ज़िक्र उस परीवस का...।' काफ़ी चर्चित हुआ था। 

मुंबई में ही अपने जम्मू एक परिचित माध्यम से पदमा जी स्वर कोकिला लता मंगेशकर जी के सम्पर्क में आईं। उनके साथ उन्होंने कोई 1000 रिकार्डिंगस अटैंड किये। उसी दौरान उन्होंने लताजी पर एक महत्वपूर्ण किताब भी लिखी, 'ऐसा कहाँ से लाऊँ..." जो हिंदी मराठी में काफ़ी लोकप्रिय हुई। 

उनकीं अनेक कहानियों टेली-धारावाहिकों तथा लघु फिल्मों में रूपांतरित किया गया तथा उनके हिंदी और डोगरी गीतों को व्यवासयिक हिंदी सिनेमा ने भी इस्तेमाल किया। उन्होंने अपनी भाषा को पहला संगीत डिस्क 'डोगरी के सलोने गीत' भी दिया, जिसमें न केवल गीत, बल्कि धुनें भी रची गईं और उन्हें लता मंगेशकर ने स्वरबद्ध किया। उसके रिकॉर्डस लाखों में बिके और पहाड़ों पर खूब लोकप्रिय हुए। 

मुंबई के बाद पद्मा जी ने बतौर 'मेम्बर ऑफ जर्नल कौंसिल' दिल्ली साहित्य अकादमी का रुख किया। दिल्ली आने का एक कारण उनकी बेटी मीता को मुंबई का हवा-पानी मुफ़ीद न बैठना भी था।

आपके साहित्य में भारतीय स्त्री के हर्ष और विषाद, विभिन्न मनोभावों और विपदाओं को स्थान मिला है। वह निरंतर अपनी भाषा, वर्तमान घटनाओं, त्यौहारों तथा भारतीय स्त्री की समस्याओं जैसे ज्वलंत विषयों पर समाचार-पत्रों एवं पत्रिकाओं में लिखती चली आ रही थीं।  

डोगरी में आठ कविता-संग्रह, 3 गद्य की पुस्तकें तथा हिंदी में 19 कृतियाँ; जिनमें - कविता, साक्षात्कार, कहानियाँ, उपन्यास, यात्रावृत्तांत तथा संस्मरण शामिल हैं, प्रकाशित हुए। इसके अलावा उनकी 11 अनूदित कृतियाँ भी प्रकाशित हैं, जिसमें उन्होंने डोगरी से हिंदी, हिंदी से डोगरी, पंजाबी से हिंदी तथा हिंदी से पंजाबी, अंग्रेज़ी से हिंदी तथा हिंदी से अंग्रेजी में भी परस्पर अनुवाद किया है। 

...अपने 8 दशकों में फैले शानदार जीवन में किए इस महत्वपूर्ण रचनाकर्म में सम्मलित प्रमुख कृतियाँ इस प्रकार हैं- उत्तर बैहनी, तैंथियाँ, तवी ते चनहाँ, अक्खर कुंड, नेहरियाँ गलियाँ (अँधेरी गलियाँ), पोटा पोटा निंबल, लालदियाँ, सुग्गी, चित्त चेते, शब्द मिलावा, दीवानख़ाना, मितवाघर, अमराई, गोदभरी, बू तूँ राज़ी, अब न बनेगी देहरी, नौशीन, मैं कहती हूँ आँखिन देखी, जम्मू जो कभी शहर था, भटको नहीं धनंजय, तथा बारहदरी शामिल है. उनकी आत्मकथा बूंद बावड़ी भी काफी चर्चित रहीं | 

'मेरी कविता मेरे गीत' के लिए उन्हें वर्ष 1971 का साहित्य अकादमी पुरस्कार; 1987 में सोवियत लैंड नेहरू पुरस्कार; 1987 में जम्मू-कश्मीर कल्चरल अकादमी पुरस्कार; 1993 में आंध्रप्रदेश का 'जोशुआ पुरस्कार दिया गया। वर्ष 2000 में साहित्य अकादमी ने उन्हें अनुवाद पुरस्कार और वर्ष 2001 में  भारत सरकार ने आपको अपना विशिष्ट सम्मान 'पद्मश्री' देकर गौरवांवित किया। इसी वर्ष पदमा जी को 'डोगरा अवार्ड' भी मिला। वर्ष 2007-2008 में मध्य प्रदेश सरकार द्वारा दिया जाने वाला प्रसिद्ध 'कबीर सम्मान' तथा 2015 में डोगरी आत्मकथा 'चित चेते' के लिए पच्चीसवां 'सरस्वती सम्मान' भी उनकी प्रमुख उपलब्धियों में शामिल है।

 - जितेन्द्र विसारिया

 

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