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यादों को दोहराती शिमला वाली कॉफ़ी

News Editor Tuesday 25th of August 2020 at 05:12:46 PM Blog
यादों को दोहराती शिमला वाली कॉफ़ी

शिमला बहुत ही आकर्षक पर्यटक स्थल माना जाता है। कालका जी रेलवे स्टेशन से टॉय ट्रेन में निकलने की योजना हम पूर्व ही बना चुके थे। टॉय ट्रेन का सुहाना सफ़र, पहाड़ी इलाक़े के मनमोहक दृश्य और उनके बीच दो ढाई फीट के फासले वाली नेरो गेज वाली पटरियां ऐसी घुमावदार रास्ते से गुजरती टॉय ट्रेन इठलाती, इतराती नायिका की तरह मंथर गति से बल खाती चल रही थी। हम सफ़र का आनंद लेते हुए सुरंगों से गुज़रते हुए रिमझिम फुहारों का मज़ा लेते हुए हर स्टेशन पर उतर फ़ोटोग्राफ़ी कर रहे थे, बाकि मुसाफिर भी फ़ोटो क्लिक कर वापस टॉय ट्रेन में चढ़ते उतरते रहे। पहला स्टेशन धर्मपुरा पड़ता है। उससे आगे टकसाल जो सिक्कों की ढलाई के लिए जाना जाता हैं। कुमारहट्टी, दंगसाई, बागड़ोर आते गए, बागड़ोर जो अपनी लंबी सुरंग के लिए प्रसिद्ध है जिसका नामकरण कर्नल बडोर के नाम से विख्यात है। टॉय ट्रेन सोलन, कंडाघाट से निकल अंततः हमें शिमला की हसीन वादियों में पहुंचा देती है। मैं और निहारिका अपने लगेज के साथ पहले से बुक करा लिए गए होटल में पहुंचे और फ्रैश हो लंच किया फिर संगीत का मज़ा लेने लगे। सफ़र की थकान उतारने का बिस्तर में लेटे हुए संगीत सुनने से अच्छा तरीका और क्या हो सकता है? "सुनो, निहारिका कल हम पहाड़ों की रानी शिमला का चर्च देखेंगे।" डॉ. खुशी ने संगीत की धुन में खलल डालते हुए कहा। "हां! और तिरंगे के साइड वाले शॉप से हार्ट कॉफी भी पीनी है मुझे विद यू।" निहारिका ने शरारती निगाहों से उनकी ओर देखा। “वहीं थ्री इडियट की शूटिंग वाली जगह भी है। शाम के वक़्त सैलानियों की पसंदीदा जगह वही है।" उन्होंने ऊंघते हुए अपनी बात रखी।

प्रात:काल में जाखू मन्दिर, माल रोड का वेक्स म्यूजियम फिर परसो ग्रीन वेली चलेंगे और पूरा दिन वहीं बिताएंगे। "निहारिका ने जब ये वाक्य बोला तो उसकी आंखों में चमक सी आ गई। उन्होनें हैरत भरी नजरों से उनको देख अपनी भृकुटियों को सिकोड़ लिया "ग्रीन वेली कुछ खास हैं क्या वहां?"  "हां, डॉ. साहिबा, चर्च का कॉफी शॉप और ग्रीन वेली की वादियां जो अपने हरित आंचल में मुझे दस वर्ष के बाद भी लपेटे हुए हैं।"

धीरे-धीरे सुरमई शाम ने देखते ही देखते पूरे शहर का नज़ारा ही बदल डाला। हम थोड़ा रिलेक्स होने के बाद अपने होटल रूम से निकल नीचे की तरफ चार पांच सीढ़ियां उतरते हुए वहां जा बैठे जहां होटल में ठहरे हुए सैलानियों ने रंग जमा रखा था, जिनमें कुछ नव विवाहित जोड़े, कॉलेज के युवा- युवतियां कपल में बैठे कॉफी, विस्की जैसे पेय पदार्थ लिए एक- दूसरे से सटकर, तो कुछ लड़कों के कंधे पर सिर टिकाए लड़कियां तथा कुछ नव युवक सिगरटों के कश लगा धुंए के छल्ले बना आकाश की ओर मुंह कर उस धुएं को उड़ा रहे थे। वहां दीवार पर लगे फ्लावर्स पोट्स जिनमें, लिली, डलिया और अन्य विविध प्रकार के पुष्प लगे हुए थे, दिन में रंगत बिखेरते ये पुष्प अब प्रभावहीन हो चले थे, खुले आकाश के नीचे बांस को चीर कर बनाई गई कुर्सियां कांच की टेबल, एक लोहे से बना झूला भी लगा था। हम जाकर कुर्सियों पर पैर रख बैठ गए।

सामने का दृश्य पूरी तरह से रूप बदल चुका था, रंग-बिरंगे खिलौनों से प्रतीत होते ढलान वाली छतों वाले घरों में लगी लाइट्स चमकते जुगनू सी लग रही थी। पूरा शहर काली सितारों की चुनर ओढ़े खड़ा था। खुले आसमान के नीचे हमें हल्की सी ठंड महसूस होने लगी, मैंने दोनों हाथों को बांध लिया।"निहारिका अंदर चले।" डॉ. खुशी ने उनकी हालत देखते हुए कहा। "नहीं, थोड़ी देर और बैठते हैं।" "ओके" उन्होंने नज़ाकती अंदाज में स्वीकृति दी। हमारी हल्की ठंड महसूस होने की भनक शायद वेटर को पड़ चुकी थी उसने पास आकर "मैम आप लोग कुछ लेंगे? "हां! दो गरमागरम हॉट कॉफी और हां बड़े मग में लाइएगा।" खुशी ने आर्डर देते हुए बोला। सामने बैठी वह अचंभित भाव से उन्हें देख रही थी जैसे मन चाही मुराद मिल गई। "अच्छा आप तो इस शहर से वाक़िफ है तो बताइए कि खास जगहों के अलावा क्या कोई लोकल एरिया भी घूमने के लिए है?" प्रतिउत्तर में निहारिका "पता नहीं बस इतना जानती हूं कि मेरी जीवन यात्रा का एक बेहद खास पड़ाव अवश्य रहा है, जिसे मेरे लिए भुला पाना नामुमकिन है।" वो अपने हाथों की उंगलियों को एक-दूसरे के बीच फंसा सामने काली परत चढ़ी पहाड़ियों, टिमटिमाती बल्ब की रोशनी नभ तारिकाओं में नज़र गढ़ा लेती हैं। जैसे ही शून्यता पसरने को हुई वेटर की धीमी आवाज़ "मैम आपकी हॉट कॉफी" उस शून्यता में खलल डालकर वह फुर्ती से चला जाता है। डॉ. ख़ुशी "दिल वाली कॉफी में शुगर डालकर चम्मच से घोल मिटा देने की हिम्मत मुझ में नहीं "और उन्हें देख वो खिलखिला दी। "लाइए मुझे दीजिए दिल तोड़ने में हम माहिर है, रुसवाई मुझे कबूल है।" उसने कॉफी में बने हार्ट को बेरहमी से बिगाड़ कॉफी उनकी ओर बढ़ा दी। ऐसा क्या हो गया निहारिका जब से हम इस शहर में आए तुम गुम सी होती जा रही हो?" डॉ. खुशी ने धीमे स्वर में पूछा।

उदासीनता भरी नीरस आवाज़ उभर आई "दस साल पहले इस शहर ने बहुत कुछ छीन लिया, जब हम कॉलेज टूर का बहाना कर तीन कपल यहां घूमने आए थे। उन्हें दोनों हाथो से मग पकड़ लिया चुस्की ली, रवि मुझे फर्स्ट ईयर से बहुत पसंद था। उसे भी शायद मैं पसंद रही होंगी। कभी वह डायरी में लिखे नोट्स के बहाने मुझ से बात करता, कभी- कभी करीब आ बैठता और मेरी तारीफें किया करता। उसकी बहुत सारी गर्ल्सफ्रेंड्स थीं जिनसे अक्सर वह घिरा रहता। मैं आंचलिक लड़की संकुचित स्वभाव के कारण थोड़ा दूर ही रहने की कोशिश करती पर उसका सभी गर्ल्स दोस्तों से नजरें चुरा मुझे मुस्कुराकर देखना, स्पेशली हाय बोलना, तकरीबन रोज़ डायरी ले ये कहना यार तुम शायरी बड़ी ही अच्छी लिखती हो जो डायरी के अंतिम पन्नों पर लिखी होती थीं। मैं नोट्स लिख ही नहीं पाता, उन्हें पढ़ ही तुम्हें लौटा देता हूं।" वो पहाड़ी ही था। नैनीताल के किसी गाँव का, पर रहता दिल्ली में था। कॉलेज टूर के लिए उसी ने मुझे मनाया और हम सभी नवम्बर माह में शिमला आए। दोपहर में यहां पहुंच पुराना चर्च घूमने निकले हमने खूब मस्ती की ध्वज के नीचे, पास वाली प्रतिमाओं के साथ फ़ोटो खींची। अचानक ही हल्की सी स्नो फॉल ने तापमान गिरा दिया। मैंने जींस और रेड जैकेट पहनी थी बस गलौज रूम पर ही भूल गई, तब इतनी ठंड बढ़ने का अंदेशा भी नहीं था, रात के साढ़े नौ बज चुके थे रवि ने बातों ही बातों में हाथ पकड़ लिया चौंकते हुए "अरे तुम्हारे हाथ तो बिल्कुल ठंड से बर्फ हो गए हैं और तुमने बताया तक नहीं। रुको! मैं कॉफी लाता हूं।" उसने नाराज़गी जाहिर करते हुए कहा। मैंने उसे कहां "मैं भी साथ ही चलती हूं अकेले यहां भी क्या करूंगी सभी खुद में मशगूल हैं।" उसने अपने हाथ को घुमा मुझे बाजू से पकड़ लिया, मैंने भी उसे कमर से पकड़ इसके धड़कते दिल पर सिर रख लिया, हम कॉफी पीने लगे। कॉफी का एक-एक घूंट लेते हुए उसकी भूरी आंखें मुझे बड़ी शिद्दत से देखती रहीं, वह मेरी ओर देख हंस पड़ा। मैंने भोंहे नचा, अधखुली आंखों के इशारे से हंसने की वज़ह जाननी चाही उसने मेरे लबों पर लगी झाग चढ़ी कॉफी की बाउंड्री को चॉकलेट कलर की लिपस्टिक लगे अधरों से साफ़ करते हुए कहा "पूरी चॅाकलेट वाली कोल्ड कॉफी लग रही हो। मैं ठंड और शर्म से लाल हो गई थी। ठंड से सुन्न पड़ने लगी, दांत बजने की नौबत आने लगी हम अपने कमरे में लौट आए मैं बिस्तर पर लेटी और रवि ने कम्बल ओढा दिया और वहीं पैर पसार साथ बैठ गया अचानक नींद ने दस्तक दे दी। सारी रात हम एक दूसरे की बाहों में सोते रहे। सुबह जब उठी तो रवि पास में नहीं था। मैंने बाकि लोगों से पूछा भी किन्तु किसी को भी बिना बताए वो हमेशा के लिए जा चुका था। उसके बाद आज तक मैं बस उसका इंतजार ही कर रही हूँ।”

डॉ. खुशी ने इस बीच एक शब्द भी नहीं बोला वह आज कॉफी का मज़ा भी नहीं लें पाई मग में ठंडी कॉफी पर फटी मलाई तैर रही थी। वे बिल्कुल स्तब्ध बैठी थीं। जैसे ही उन्होंने उकड़ू बैठने की कोशिश की तो चीनी मिट्टी से बना मग टूट कर ज़मीन पर बिखर गया जिसे देखकर लग रहा था कि निहारिका एक बार फिर रवि की यादों में टूटकर बिखर रही हो। सामने बैठी खुशी ने सहजता से उसे ढाढस बंधाते हुए कहा, “यार, बहुत हुआ इंतजार, अब जीवन को नये ढंग से आरम्भ करो। लोग जब बिना बताए दूर चले जाते हैं तो उनका इंतजार नहीं किया जाता, अपितु जीवन को एक नए सिरे से आरम्भ किया जाता है। चलो अब सोने चलें।” आधी रात बीत चुकी थी और दोनों अपने रूम में चली गईं।

लेखिका - डॉ. राजकुमारी

(लेखिका दिल्ली विश्वविद्यालय के जाकिर हुसैन दिल्ली कॉलेज (सांध्य) में हिंदी प्रवक्ता हैं। ये किस्सा लेखिका के विभिन्न किस्सों के संग्रहइश्क़--कॉफ़ीका पांचवां किस्सा है। लेखिका की इससे पहले ‘दर्द-ए-लफ्ज़’ शायरी संग्रह काफी चर्चित रहा। चार पुस्तकों की लेखिका विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में अनवरत लेखन कार्य करती रहती हैं।)

पहला किस्सा मैम आपका मग नीचे रख आऊँ पढ़ने के लिए क्लिक करें

दूसरा किस्सा पेरिस से आया मेरा दोस्त पढ़ने के लिए क्लिक करें

तीसरा किस्सा मजनू के टीले वाली कॉफ़ी पढ़ने के लिए क्लिक करें

चौथा किस्सा आँखों में प्यार ही प्यार बेशुमार पढ़ने के लिए क्लिक करें

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