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ये प्यार था या कुछ और था?

News Editor Wednesday 9th of September 2020 at 08:50:08 AM Blog
ये प्यार था या कुछ और था?

मेट्रो स्टेशन की स्वचालित सीढ़ियों की ओर कदम रखा ही था कि पीछे से किसी परिचित आवाज़ में ‘सुनिए खुशी मैम आप? मैम नमस्ते कैसी हैं आप?’ औपचारिक बातों के ख़तम होने पर उसकी गर्लफ्रेंड जिसके साथ वो कॉलेज के चप्पे-चप्पे यहां तक की डॉ. ख़ुशी की क्लास की चौखट तक छोड़ना, क्लास ख़तम होने पर वहीं से ले जाना फिर निर्धारित क्लास छूटने के समय उन दोनों का कॉलेज के गेट पर बाहर से आते वक़्त भेंट हो जाना, लगभग ऐसा सप्ताह में दो तीन दिन हो जाता था। इस प्रेम प्रसंग को गत तीन वर्षो से डॉ. ख़ुशी ने देखा जिसमें दूर तक ये एहसास भी नहीं था कि जुदा भी होंगें। प्रेम में लीन आसिफ़ ‘असलाम वालेकुम’ कहता तो अनुभूति उसी स्नेह से ‘नमस्ते’ करती थी। कभी-कभार लिफ्ट से उतरते वक्त कॉफी मग के साथ भी गलैरी में मुलाकात हो जाती थी।

यौवन की दहलीज पर कदम रखते छात्र-छात्राओं के मन की उमंग के सतरंगी हसीन ख़्वाब की ताबीर को, उनके स्वयं के अनुभवों पर छोड़ देना ठीक होता हैं। नकेल या लगाम कस घोड़ा वश किया जा सकता है युवा हृदय इन बाध्यताओं को अस्वीकार कर अधिक शक्ति से तोड़ने पर उतारू हो जाता है।

कॉलेज से पास आउट होने के तीन साल बाद एक दिन अकस्मात ही डॉ. ख़ुशी की मेरी मुलाकात आसिफ़ से हुई। डॉ. ख़ुशी ने आसिफ़ से अनुभूति के विषय में पूछा तो उसने बात टालते हुए कहा, “मैम आपकी क्लास तो अभी डेढ़ घंटे बाद है चलिए ना इस सामने वाली शॉप में कॉफी पीते हैं। मुझे मालूम है आपको कॉफी ही पसंद है आइए ना मैम प्लीज़।” कश्मीरी गेट मेट्रो स्टेशन पर बने शॉप पर हम गए उसने फीकी सी मुस्कान देते हुए, “मैम आप बैठिए, मैं कॉफी बोल कर आता हूँ। हम सीमित सी शीशों वाली शॉप में बैठ गए उसने सिर झुका धीमी आवाज़ में कहा, "आपसे क्या छुपाना मैम, वो तो कब का मुझे छोड़ कर चली गई पर अब मुझे कोई फ़र्क नहीं पड़ता वो कहां है? किसके साथ है?" उसका चेहरा बिल्कुल बेरौनक हो गया। तभी खुशबूदार कॉफी ने सूफियाना इश्क़ सा असर छोड़ दिया। “लीजिए मैम आपकी कॉफी। मैम मैं जब आपको कॉफी कप के साथ देखता था तो सोचता था कि कभी ऐसा हो मैं आपके साथ कॉफी पीऊं। यकीन नहीं आ रहा कि आप साथ बैठे हो, वो भी मेरे साथ कॉफी पीने। दुआ कबूल सी लगती है।" डॉ.खुशी ज़ोर से हंसने लगी "आसिफ़ तुम भी ना।" अपने हाथों में नाज़ुक कॉफी कप उठाए हुए उन्होंने तुरन्त अनुभूति की बात दोहराई। बात क्या हुई थी आसिफ़ इस ब्रेक अप का रीजन क्या था? सच तो ये है कि मुझे मालूम था कि यही होगा। खैर, हुआ क्या था ये बताओ। "उसकी पीड़ा को जानने की प्रबल इच्छा मन में हो रही थी। उसने झेंपते हुए, "मैम लोग खामख्वाह ही इश्क़ की अफ़ीम चाट बैठते। होश गवां फितूर की दुनियां में झूमते हैं।" उन्होंने उसके दुःख को संबल प्रदान करते हुए,  "हां, जिसके पटाक्षेप के पीछे का सच कोई दूर-दूर तक नहीं देखना चाहता। ऊंची अरमानों की ख्वाइशों की कशिश, प्रेम की भावनाओं में सराबोर हृदय, सांकेतिक भाषा का जस्क, छुप छुप मिलना, आकर्षण की अंधता कहीं का नहीं छोड़ती।"

“जी, विनाशकाले विपरीत बुद्धि। आपने किसी दिन अपनी क्लास में लेक्चर देते कहा था। उसी ने बताया था कि मैम ने आज ये वाक्य बोला था। मेरी भी मति मारी गई थी उस वक्त उसके सिवाय कुछ नहीं दिखता था। बस वक़्त- बेवक्त एक ही शक्स की गिरफ्त में, उसी के इर्द-गिर्द घूमती दुनियां। बाकी सब विलुप्त हो जाता।” कॉफी का स्वाद ले उसने सामने लगे पिज्जा बर्गर पोस्टर को देख पुराने साहस से एहसास समेट लिए "जब हम मिले थे। वह बहुत साधारण थी। सूट- सलवार दुपट्टा और जुल्फें कंधे पर बिखरा रखती थी। सुंदर नयन-नक्श उसका हँस-हँस मुझे देखना, मेरे नोट्स बनाना, कैंटीन से लेकर रेस्टोरेंट तक, गाड़ी लेकर कॉलेज के समय में लॉंग ड्राइव पर जाना, अब वह पोशाक भी वेस्टर्न पहनती है। कभी जब दोस्तों के साथ होते तो उसकी चंचल निगाहें मुझ पर कम टिकती। मैं शनैः - शनैः इस बदलाव को देख रहा था और कभी- कभी सोचता तो मन ही मन बुदबुदाता यार मैं भी क्या पागलों वाली बातें सोचता हूँ, वो तो जी ही नहीं सकती मेरे बिना, बस क्षणिक विचार यही सोच लुप्त हो जाते। भनक तक नहीं लगी कभी कि अचानक वह ये रुख बदल लेगी। जैसे ही तीसरे साल में शादी की बात छेड़ी वह उखड़ने लगी। अब वो मुझसे कटने सी लगी। कहने लगी मेरे घर वालें नहीं मानेंगे।” ये कहते वह उसके ख्यालों में खोता चला गया "मैम मैंने उसके लिए क्या - क्या नहीं किया।” अब उसका मुख मंडल मलिन, शब्द घायल से लगने लगे थे। वह लगता बोलता ही जा रहा था "उसके हर जन्मदिन पर कीमती तोहफ़े दिए, एक दिन उसने मेरी बाजू पकड़ मज़ाक में हँसकर कहा, "मुझे मेरे बर्थडे पर इस बार डायमंड रिंग चाहिए। लोगों को पता तो चले कि मेरा बॉयफ्रेंड कितने बड़े बिजनेसमैन का बेटा है।”

"मैनें उसे वही रिंग लाकर दी। उसने मेरे गाल को जोर से चूम आई लव बोला था।" उसे ये कहता देख ऐसा प्रतीत हो रहा था कि अगर कंधा मिल जाए तो बिलख कर रो पड़े।

कॉलेज छूटने के बाद एक दो बार ही मिले। मैसेज या फोन पर बात होती। जब उसका मन करता जवाब देती। वरना ऑनलाइन होने पर भी इग्नोर कर देती थी। अब मेरा मन उचटने लगा। पूछता तो खींज कर कहती "मुझ पर शक करते हो? आसिफ़।" डॉ. ख़ुशी ने अपनी आधी कॉफी छोड़ रखी थी। वो उसे अपने दोनों हाथों को बांध ठोड़ी के नीचे पीलर बना टिकाए बिना टस से मस हुए उसे अपनी उदासी भरी नजरों से देखे जा रही थी। आसिफ़ ने उनकी ओर देखते हुए शांत लहज़े में कहा, "मैम कॉफी कोल्ड कॉफी हो गई, दूसरी कॉफी मंगवाता हूं।"  "नहीं, नहीं आसिफ़।" कह उसे हाथ के इशारे से आधे उठ चुकने के बाद बैठा दिया। वे उसे करुण दृष्टि से देख "फिर क्या हुआ,आसिफ़?" उन्होंने अपने हाथों को खोल टेबल पर फ़ैला दिया।

अपनी बची हुई सारी कॉफी की घूंट से गला तरकर के निराशावादी स्वर में, "उस दिन उसकी ऊटपटांग सी हरकतें थी। उसने फोन स्क्रीन पर टैक्स्ट मैसेज छोड़ा कि उसे पचास हज़ार रूपए चाहिए। साथ में अकाउंट नंबर की डिटेल्स थी। मैंने उसे कॉल किया और पूछा कि इतने पैसे अचानक उसे क्यों चाहिए? उसने गुस्से में जवाब दिया, "अब इतना भी विश्वास नहीं रहा मुझ पर।" मैंने अपनी सफाई पेश की कि मेरे पास इतने पैसे नहीं हैं तो कहां से दूं?"

अब वो रोष से भर चुकी थी "तो ठीक है। तुम अब मुझे भूल ही जाना।" उसने फोन डिसकनेक्ट कर दिया। मैंने बहुत कोशिश की उसे समझाने की किन्तु उसने मेरी एक नहीं सुनी, उसका नंबर नोट रिचेबल या स्विच ऑफ आने लगा। एक मित्र ने बताया कि उसने थोड़े ही दिनों पहले अपना फोन नंबर बदल लिया है। मुझे उसके पीछे अपने लट्टूपन पर अब कोफ़्त हो आता हैं। सुना था लडक़े धोखेबाजी, फ्लर्ट करने में माहिर होते हैं किंतु सिक्के के दूसरे पहलू का ज़िक्र कोई नहीं करता। लेकिन मेरा अनुभव ये कहता है कि लड़कियां पैसे के पीछे खूब भागती हैं। फिलिंग हर्ट तो लड़कों की भी खूब होती है क्योंकि इंसान हैं वो भी। उसने मुझे दूध से मक्खी की भांति निकाल फेंक दिया।

एक महीने बाद जब मैं अपने बिजनेस के सिलसिले में करोलबाग गया तो उसे किसी और लड़के के साथ मर्सडीज गाड़ी से उतरते हुए मिनी स्कर्ट, ब्लू कॉर्प टॉप में देखा। वह उस हैंडसम लड़के की बाहों को पकड़ होटल में चली गई। मैं उसकी तरफ़ पीठ घूमा खड़ा हो गया और उसके अंदर चले जाने पर उसी लाइन में बनी बिल्डिंग में अपने काम की डील कर लौट आया। उस दिन मुझे उसकी असलियत का पता चला। उसके लिए अपने पागलपन पर मुझे पछतावा भी आया।" भंवरों को कलियों पर मंडरा रस चूस उड़ते सुना था, अब तो लगने लगा है कलियां भंवरों का शिकार करने लगीं हैं। कोई तन का उजला भले ही ना हो परन्तु मन का साफ़ होना बहुत ज़रूरी है।”

डॉ. खुशी ने आसिफ़ की टूटन को देख गहरी लंबी रुकी सांस छोड़ते हुए कहा, “आसिफ़, भूल जाओ, सब कुछ। बस याद रखो, वर्तमान तुम्हारा है, अतीत नहीं।  किसी शायर ने ठीक ही कहा है -

"प्यार हो या परिंदा खुला छोड़ दो,

लौट आया तो तुम्हारा, नहीं तो तुम्हारा था ही नहीं।

अब मुझे भी चलना चाहिए।” "जी चलिए मैम, आपको एग्जिट तक छोड़ दूं।" उसने खुदा हाफ़िज़ कह हाथ हिला बाय बोल मुस्काकर अलविदा किया।

 

लेखिका - डॉ. राजकुमारी

(लेखिका दिल्ली विश्वविद्यालय के जाकिर हुसैन दिल्ली कॉलेज (सांध्य) में हिंदी प्रवक्ता हैं। ये किस्सा लेखिका के विभिन्न किस्सों के संग्रहइश्क़--कॉफ़ीका आठवां किस्सा है। लेखिका की इससे पहले ‘दर्द-ए-लफ्ज़’ शायरी संग्रह काफी चर्चित रहा। चार पुस्तकों की लेखिका विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में अनवरत लेखन कार्य करती रहती हैं।)


पहला किस्सा मैम आपका मग नीचे रख आऊँ पढ़ने के लिए क्लिक करें

दूसरा किस्सा पेरिस से आया मेरा दोस्त पढ़ने के लिए क्लिक करें

तीसरा किस्सा मजनू के टीले वाली कॉफ़ी पढ़ने के लिए क्लिक करें

चौथा किस्सा आँखों में प्यार ही प्यार बेशुमार पढ़ने के लिए क्लिक करें

पांचवां किस्सा यादों को दोहराती शिमला वाली कॉफ़ी पढ़ने के लिए क्लिक करें

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